ढूँढता फिर रहा हूँ कोई ऐसा हमराज़,
जो सुन सके मेरे दर्द-ए-दिल की आवाज़।
जिसे अपना समझा, वही दूर होता गया,
हम उम्र भर तरसते रहे उसे अपना बनाने को।
रात भर चाँद से तेरा पता पूछता रहा,
कोई नहीं था पास, मुझे सीने से लगाने को।
मेरी आँखों में आज भी तेरा इंतज़ार है,
और तूने वक़्त भी न दिया लौटकर आने को।
मैंने तो मोहब्बत में ख़ुद को ही खो दिया,
तूने भी क्या पाया मुझे यूँ तन्हा छोड़ जाने को।
अब किससे कहूँ कि तेरे बाद क्या बचा है,
एक दिल है जो धड़कता है बस दर्द छुपाने को।
लोग कहते हैं वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है,
मेरा ज़ख़्म तो और गहरा हुआ तुझे भुलाने को।
ढूँढता फिर रहा हूँ आज भी उस माज़िद को,
जो मुझे मुझसे भी बेहतर समझ सके।
-माजिद खा
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