आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"अनासक्ति का आलोक-वृत्त"

                
                                                         
                            मैं एकांत को चुनता हूँ
                                                                 
                            
जैसे चेतना अपने केंद्र में लौटती है,
न पलायन की विवशता से,
न विरक्ति की उदासी से।

बंधन मुझे भयभीत नहीं करते,
पर उनका स्वामित्व-बोध
अंतर की स्वाधीन लय को
धीरे-धीरे क्षीण कर देता है।

मैं बँधना नहीं चाहता,
क्योंकि बँधते ही दिशाएँ
अदृश्य संधियों में बँट जाती हैं
और गति किसी और की हो जाती है।

न ही मैं बाँधना चाहता हूँ,
किसी आत्मा की उड़ान को;
हर अस्तित्व स्वयं में पूर्ण है,
अपने अक्ष पर परिभ्रमित।

फिर भी एक सूक्ष्म वृत्त है,
जो संबंध का आभास देता है,
पर सीमाएँ नहीं रचता,
केवल उपस्थिति का विस्तार करता है।

उसे ही मैं स्नेह कहता हूँ,
जो बाँधता है तो विखंडन से,
और खोलता है
भीतर की जड़ गिरहों को।

उसमें निकटता है पर आसक्ति नहीं,
ऊष्मा है पर अधिकार नहीं,
एक सह-अस्तित्व की निःशब्द स्वीकृति
जहाँ स्वतंत्रताएँ परस्पर अवकाश पाती हैं।

अतः मेरा एकांत रिक्ति नहीं,
एक दार्शनिक संतुलन है—
जहाँ स्नेह का बंधन भी
स्वाधीनता का ही विस्तृत रूप बन जाता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर