कविता : आखिर क्यों ?
क्यों सुबह घिर आई, मुझे शाम में जीना था,
चाहिए था वो सब कुछ, जो उसने छीना था।
क्यों लौट आया ये नूर, मुझे बेनूर ही रहना था,
मिला वो सब कुछ, पर मुझे वो सब गँवाना था।
जो छूट गया पीछे, बस वही मेरा अपना था,
ये उजला सा जो दिखता है, ये सिर्फ एक सपना था।
हाथों में रानाई है, पर आँचल खाली है,
आँखों में नूर सही, पर रूह में तारीकी का साया भारी है।
लोग कहते हैं मुश्किल से मिलती है ये मंज़िल,
पर कोई इनसे पूछे, क्या ये पाके खुश है दिल?
क्यों महफ़िल के बीच भी ये तन्हाई रोती है,
ऐसे जीने से तो शब की ख़ामोशी अच्छी होती है।
मेरा हक़ तो था बस उस दर्द की छाँव पर,
ये कैसा मरहम लगाया मेरे ज़ख्मी पाँव पर?
अब न कोई ख़्वाहिश है, न अज़ीज़ कोई सपना,
जिसे सबने ठुकराया, वही सन्नाटा था अपना।
- प्रद्युम्न त्रिवेदी
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