मनुष्यों के पास
होती हैं
पांच नहीं
बल्कि दस इंद्रियां
इनमें से पांच ज्ञानेंद्रियां
और पांच होती हैं
कर्मेंद्रियां
मिला लें इनके साथ
यदि मन को भी
तो हो जाती है
कुल इंद्रियों की संख्या
ग्यारह
मन का क्या है!
वह तो रहता है उलझा
तमाम प्रकार की
वृत्तियों में ही
कहीं इच्छा, कहीं लोभ
कहीं क्रोध, कहीं मोह
इन सबके बीच
होकर चंचल
रहता है भटकता मन
इंद्रियों को मिलता नहीं
जब काम
तो लगती हैं भटकने वे
पर मन को साधने से
इंद्रियों को साधना भी
हो जाता है आसान
हालांकि काम कोई
है नहीं
सरल यह
लेकिन रखना नियंत्रण मन पर
है बहुत ज़रूरी
चंचल मन को
केंद्रित कर रखने में ही है
इंसान की समझदारी
और उसकी होशियारी।
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