करो प्रकाशित जीवन का हर दृश्य तुम्हारी आंखों में!
अगर हो हार तुम्हारी आंखों में तो है जीत तुम्हारी आंखों में
अगर हो डर तुम्हारी आंखों में,, तो है साहस तुम्हारी आंखों में।
करो प्रकाशित जीवन का हर दृश्य तुम्हारी आंखों में,,
कभी सोचा है कि,,कलिया भी कांटो के बीच में खिलती हैं,,,
खिलके फूल बनती है फिर जाके ईश्वर के चरणों में चढ़ती हैं।
कभी सोचा है कि फूलों को पीसा कुचला जाता,,
इत्र बना कर बाजारों में,, बड़ी कीमतों पर बेचा जाता है
अगर डर जाती कांटो से तो क्या इतनी कीमती बन पाती
घर आंगन त्योहारों से लेकर क्या ईश्वर के चरणों में चढ़ पाती।
कभी पूछा है उस टूटते पत्थर से जिसे मूर्ति कार ने तोड़ा है
कितने दर्द सहे होंगे जब हर वार पे पड़ा हथौड़ा है,,,,,
अगर डर जाता पत्थर भी हथौड़ों के इन वार से,,
न ईश्वर की छवि मिलती उसको न पूजा जाता वो किसी मंदिर या दरबार में,,
कभी सोचा है कि सोने को भी तपती आंच में पिघलाया गलाया जाता है,,
तब जाके उससे एक सुन्दर आभूषण बनाया जाता
सोना भी अगर तपती आंच को न सह गई होती,,,
शायद उसकी कीमत भी कोयले ओर राख से रह गई होती,,,...
कहूँ अगर मैं तुम फूल हो,,तुमको भी कांटो के बीच उगना होगा,,
अगर महकना है जीवन में तो थोड़ा सा तो पिसना होगा।
अगर कहु तुम पूज्यनीय हो तो तुमको भी वार सहना होगा
पड़े न ठोकर गैरो की ऐसे आकार में ढलना होगा।
अगर कहु तुम कीमती हो तो तुमको भी ताप सहना होगा
चमक अगर बढ़ानी है तो ,, हीरे जैसे घिसना होगा...
संघर्ष भी होगा चुनौती भी होगी ,कठिन दृश्य की कसौटी भी होगी,,,
ताप भी होगा आंच भी होगी,, उम्मीदों की आशा खाक भी होगी।...
कभी अनदेखा मंजर होगा,,कभी पीठ के पीछे खंजर होगा।
तुम्हे इन्हें कुचलना होगा हर हाल में आगे बढ़ना होगा...
अगर चाहिए तेज सूरज सा तो प्रकाश से पहले ढालना होगा,,,...
तभी बनेगा इतिहास का,, हर एक मंजर तुम्हारी आंखों में...
है अगर धरा तुम्हारी आंखों में तो ,,सिकन्दर तुम्हारी आंखों,,
तभी कर पाओगे प्रकाशित जीवन का हर दृश्य तुम्हारी आंखों में,,
है अगर हार तुम्हारी आंखों में तो हो जीत तुम्हारी आंखों में
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