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मुसाफ़िर समझती हूँ

                
                                                         
                            हमसे रूबरू होना आसान नहीं,
                                                                 
                            
हम ख़ुद को काफ़िरों में गिनते हैं।
तुम्हें बहुत हिम्मत,
और बहुत ताक़त जुटानी पड़ेगी।
मैंने यह बात,
उसे डराने के लिए नहीं कही थी,
बस इसलिए कि,
वो मेरे भीतर के उजड़े हुए शहर को,
देख ले।
वो मुस्कुराई।
बोली…
"बस इतनी-सी बात?"
मैंने कहा…
"तुम समझ नहीं रही हो।
मेरे अंदर,
बहुत सारे बंद दरवाज़े हैं।
कुछ पर पछतावे पहरा देते हैं,
कुछ पर ख़ामोशियाँ,
और कुछ कमरों में,
मैं ख़ुद भी बरसों से नहीं गया।"
वो चुपचाप सुनती रही।
मैंने फिर कहा…
"मैं उन लोगों में से हूँ,
जो भीड़ में हँसते हैं,
और रात को,
अपने ही सवालों के साथ,
जागते रहते हैं।
मुझ तक पहुँचना,
किसी सड़क का सफ़र नहीं,
एक जंगल पार करने जैसा है।"
वो धीरे से मेरे पास आई,
और बोली…
"जंगलों से मुझे डर नहीं लगता।
डर तो मुझे उन लोगों से लगता है,
जो फूलों का बाग़ दिखाकर,
काँटे उगा देते हैं।"
मैंने पहली बार,
उसकी आँखों में देखा।
वहाँ चुनौती नहीं,
सुकून था।
मैंने पूछा…
"अगर रास्ते में
मैं ही बदल गया तो?"
वो मुस्कुराकर बोली…
"नदियाँ भी तो,
हर मोड़ पर बदलती हैं,
फिर भी समंदर,
उनका इंतज़ार करना नहीं छोड़ता।"
मैंने आख़िरी कोशिश की।
कहा…
"मेरे भीतर,
यक़ीन से ज़्यादा शक रहता है।
मैं हर रिश्ते को,
दूर से परखता हूँ।
कहीं ऐसा न हो,
कि तुम थक जाओ।"
उसने मेरी बात पूरी होने से पहले ही,
मेरा हाथ थाम लिया।
और बोली…
"तुम ख़ुद को काफ़िर कहते हो,
मैं तुम्हें मुसाफ़िर समझती हूँ।
फ़र्क़ बस नज़र का है।
तुमने अपने भीतर,
टूटे हुए हिस्से देखे हैं,
मैंने उनमें,
अब भी धड़कता हुआ इंसान देखा है।"
मैं चुप हो गया।
क्योंकि पहली बार,
किसी ने मुझे, बदलने की कोशिश नहीं की,
सिर्फ़ समझने की।
तब जाना…
रूबरू होना, हिम्मत का काम ज़रूर है,
मगर ताक़त, उस इंसान को नहीं चाहिए,
जो सामने खड़ा है,
ताक़त तो उसे चाहिए,
जो पहली बार,
अपनी सारी दीवारें गिराकर,
किसी को अपने भीतर आने देता है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
52 मिनट पहले

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