किसी के दिलबर का मुझपे नाज़ हो जाए,
ये कितना जाज़िब है वो मेरी आज हो जाए,
दफन दिल में हुएं जैसे कई अरमां,
मोहब्बत भी न दबी आवाज हो जाए,
तबाही हर सल्तनत ने देखी है,
नया क्या कि खाली ताज हो जाए?
मुकद्दर में गमें है जब,
हमें किस चीज पर नाज हो जाए?
वहीं जो पहचान है मेरी,
कल शायद फीकी लाज हो जाए,
खबर उसने नहीं लेनी कभी मेरी,
मेरे भी पूछने से हां शायद नाराज हो जाए,
जो होना है, वो सब कुछ आज हो जाए,
मेरा होना जहां में इस, राज हो जाए।
– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X