फिल्मी गीतकार के रूप में महरूह सुल्तानपुरी वक्त को छोटा करते हुए हर उम्र के साथ खड़े दिखाई देते हैं। उनके गीत केएल सहगल के साथ-साथ सलमान खान ने भी गाए हैं। लोग उन्हें एक बड़ा गीतकार मानते हैं। ऐसा है भी क्योंकि वह शब्दों को भाव में ढालने में हर समय तत्पर रहते थे। गीतों को लिखने में उनकी उस्तादी कमाल की थी। लेकिन खुद सुल्तानपुरी सबसे पहले अपने को गजलकार मानते थे। हम अगर उनकी गजलों को देखे तो पाएंगे कि वह मोहब्बत का एक पूरा अध्याय लिए हुए हैं। सुल्तानपुरी के लिए गीत लिखना एक तरह की आजीविका थी। गीतों को लिखकर जीवन चलाने के लिए उन्हें जिगर मुरादाबादी ने राजी किया थाा। अगर मुरादाबादी उन्हें राजी किए नहीं होते तो बॉलीवुड को यह गीतकार शायद नहीं मिल पाता।
उनकी शायरी और गीतों में मोहब्बत के साथ जीवन का संघर्ष भी समाया हुआ है
सुल्तानपुरी के एक शेर पर गौर फरमाए- 'मैं अकेला ही चला, जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया'। यह शेर तो अकेलेपन को शिद्दत से बयां करता है लेकिन उनकी शायरी और गीतों में मोहब्बत के साथ-साथ जीवन का संघर्ष भी समाया हुआ है। अली सरदार जाफरी लिखते हैं कि मजरूह गजल के आंगन में किसी सिमटी सकुचाई दुल्हन की तरह नहीं बल्कि एक निडर बेबाक दूल्हे की तरह दाखिल हुए थे। ऐसे हिम्मत के साथ अगर आप आएंगे तो स्वाभाविक है इसके लिए आपके पास जोरदार झटकों को सहने की तालीम भी होनी चाहिए। सुल्तानपुरी में यह जज्बा कूट-कूट कर भरा था।
मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार नौशाद में काफी गहरी दोस्ती थी
सुल्तानपुरी ने कारदार साहब की फिल्म शाहजहां से अपने गीतों का सफर शुरू किया था। इस फिल्म का गीत 'जब दिल ही टूट गया, अब जी के क्या करेंगे' को पर्दे पर केएल सहगल ने गाया है। यह गीत पुराने गीतों का जिक्र करने पर जेहन में सबसे पहले उभर आता है। मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार नौशाद में काफी गहरी दोस्ती थी। बाद में यह दोस्ती रिश्तेदारी में बदल गई। सुल्तानपुरी की बेटी की शादी नौशाद साहब के बेटे के साथ हुई थी। हिंदी फिल्मों में सुल्तानपुरी ने 50 साल तक एक से बढ़कर एक गीत लिखे। सुल्तानपुरी ने वक्त के साथ अपनी सोच और शब्दों में एक लचक रखी, इसकी वजह से वह नई पीढ़ी के नायकों के लिए भी गीत लिखे।
फिल्मों को हिट करने में इनके गीतों ने मुख्य भूमिका निभाई
1960 से 1970 का समय उनके गीतों का सबसे सुनहरा समय था। ये वह दौर था जब चुरा लिया है तुमने जो दिल को...बांहों में चले आओ...ऐसे न मुझे तुम देखों...जैसे गीत उन्होंने लिखे। इसके बाद उनके करियर में एक दूसरा बेहतरीन दौर आया 1990 से 2000 के बीच का। इस समय उन्होंने कयामत से कयामत तक, जो जीता वही सिकंदर, अकेले हम अकेले तुम, खामोशी द म्यूजिकल जैसे फिल्मों के लिए गीत लिखे। इस सभी फिल्मों को हिट करने में इनके गीतों ने मुख्य भूमिका निभाई।
वह पहले गीतकार हैं जिन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया
बात 1949 की है। जब सरकार विरोधी गीत लिखने की वजह से सुल्तापुरी को जेल भेज दिया गया। सुल्तानपुरी से कहा गया कि अगर माफी मांग लेते हैं तो उन्हें रिहा कर दिया गया जाएगा। पर उन्होंने माफी नहीं मांगी। इस दौरान उनके परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। इसके बाद फिल्म अभिनेता राज कपूर ने मजरूह सुल्तानपुरी से गीत गंवाए और उसका मेहनहताना उनके परिवार को भेज दिया। सुल्तानपुरी को इकबाल और गालिब सम्मान मिला। इसके अलावा वह पहले गीतकार हैं जिन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया। सुल्तानपुरी का जन्म 1919 में हुआ और इंतकाल 2000 में हुआ था।
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उनकी शायरी और गीतों में मोहब्बत के साथ जीवन का संघर्ष भी समाया हुआ है
8 वर्ष पहले
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