पंखुड़ी–पंखुड़ी मिल–मिल के,
खुशियों की पलंग बिछाई है,
परियों ने भर पंखों में,
नेह उड़ानों की लाई हैं,
क़दम बढ़ें स्वागत में उसकी,
मेरी प्रियसी आई है।
मन के दूर मरुस्थल में,
बरखा सावन की छाई है,
इंद्रधनुष ने रंगों से,
मानों अंबर आज सजाई है,
विरहा के रग–रग में हर्ष मगन आज उठे,
मेरी प्रियसी आई है।
कुम्हारों की चाक लाडली से,
गुड़िया की मूर्ति भाई है,
आंखों ने देखे रंग जितने,
उसमे सबसे सुंदर प्रतिमा पाई है,
चंचलता की छवि आज मनोहर बनके,
मेरी प्रियसी आई है।
तारों की दुनिया में लगता,
निखर चमक एक छाई है,
चांद–चांदनी ने अरसे से,
मिलकर सांध्य बनाई है,
उसी सांध्य में माधुर्य भरी, संगम धुन की,
मेरी प्रियसी आई है।
वो हलचल नादानी की,
गुड्डे–गुड़ियों की याद दिलाई है,
कदम–कदम पर फूल बिछें,
मानो आज सगाई है,
नयन भरे हैं अश्रु कणों से,
मेरी प्रियसी आई है।
– ऋषभ भट्ट
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