नब्ज़ बनके प्यार की तुम पकड़ में आए थे,
मोहब्बत का मरीज़ भी, डॉक्टर भी बनाए थे,
मेरे सुर में तो कोई राग ही नहीं थी,
लय बनकर जब तुम ज़िंदगी में आए थे,
जाने क्या वो बात थी जो तुम्हें पसंद आई,
वरना इससे पहले सभी ने दोस्त ही बनाए थे,
कोई बीमारी थी मुझमें दूरियां सबसे बनाने की,
तुम दवा बनके जब मेरे करीब आए थे,
मस्ला ये नहीं कि हम आज साथ नहीं,
कभी तो एक दूसरे के साथ महीनों बिताए थे,
मुझे तो आज भी तुम्हारी हर मुस्कान याद है,
होंठो पे कॉफी लगी थी जब तुम पहली दफा मुस्कुराए थे,
सादियों के पन्ने में हमारे नाम नहीं थे शायद,
तभी तो हम दोनों राधा कृष्ण बनके आए थे,
एक बात बोलूं जो तुमसे कभी कह न सका,
‘जब तक तुम थे जिंदगी में हर तरफ बाहर छाए थे’,
सोंधी मिट्टी से तेरी महक आज भी आती है,
कौन सा वो इत्र था जो तुम लगाए थे,
वो पैड आज भी वहीं कोने में पड़ा है,
मेरी नज़रों से कभी, जो तुम छुपाए थे,
मुझे लगता है तुम्हारी गलती नहीं हमारे बिछड़ने में,
वो खुदा ही थे जो आगे की कहानी भूल आए थे।
– ऋषभ भट्ट
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