मृदा के गहन नीड़ में सोई, एक अंकुर की सुप्त पुकार है।
यह विस्मृत सा कोई प्राचीन, निज अस्तित्व का विस्तार है।
अंधकार की कोख चीरकर, शून्य गगन को छूने को—
यह स्वप्न नहीं, बीज के भीतर, एक ब्रह्म की ही हुंकार है।
स्वयं मिटकर ही तो होता, वह विराट वृक्ष का प्रादुर्भाव।
स्व-नाश में ही भविष्य छिपा है, जीव-ब्रह्म का परम जुड़ाव।
क्या त्याग नहीं यह आत्म-समर्पण, क्या न पूर्ण है विसर्जन—
बीज का मरना ही तो है, जीवन का शाश्वत स्वभाव।
धरा की छाती फाड़ खड़ा, वह मौन तपस्वी धीर है।
नभ की अनंत ऊँचाइयों तक, उसका अमर शरीर है।
मिट्टी के कण-कण को पीकर, वह ऊर्ध्वगामी हो चला—
स्वप्न बीज का यही सत्य है, ब्रह्म-पथ का तीर है।
सूक्ष्म से उठ विराट हुआ, अब शाखाओं में ब्रह्म स्पंदित।
स्वयं बीज था, स्वयं वृक्ष है, काल-चक्र से पूर्ण अतिक्रमित।
स्वप्न जो देखा था मिट्टी में, वह फल बनकर झूल रहा—
परमात्मा के पावन अंक में, चैतन्य स्वयं स्पंदित।
- सनातन मुकुंद
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