प्रश्न जब चुभने लगे, उत्तर स्वयं मौन हो गए,
दीप अंतस के जले, सब बाह्य आलोक खो गए।
शब्द थे कल तक बहुत, पर अर्थ सब निर्जन हुए,
दर्प के दर्पण अचानक सत्य से भग्न हुए।
मन ने जब अंतर निहारा, भेद सारे धुल गए,
प्रश्न जब चुभने लगे, पंथ स्वयं निर्मल हुए।
सीप में क्यों जन्म लेता पीर का उज्ज्वल रतन?
रात क्यों संजोती रहती उषा का स्वर्णिम वचन?
शूल की गोदी में खिलते फूल जब हँसकर उठे,
मौन में उपनिषद् फूटे, दुःख स्वयं उजास बने।
सत्य कोई वस्तु नहीं, साधक का निर्मल सफ़र,
बूँद बनकर जो पिघलता, पा वही पाता समंदर।
स्वत्व का आवरण झरते ही मिला वह अप्रमेय,
प्रश्न ही गुरुवर बने, उत्तर हुए अंतर्यज्ञ।
नेति-नेति की ऋचाओं में अनहदों का गान है,
शून्य के भी गर्भ में छिपा पूर्णत्व का विधान है।
जो स्वयं को खोज निकला, वह जगत से जुड़ गया,
प्रश्न बनकर जो जिया, वह सत्य होकर जी गया।
अब न कोई संशय शेष, न तर्कों का कोलाहल,
मौन ही संगीत बनकर गा रहा चिर-अंतर्मंगल।
प्रश्न जब चुभने लगे, तब ज्ञात यह अनुभूति हुई—
घाव ही वे द्वार थे, जिनसे प्रकट होती प्रभा नई।
- सनातन मुकुंद
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