ऋतु वर्षा की आई, गगन ने घन-घूँघट सरकाया,
श्यामल केश सँवार धरा ने नव यौवन फिर अपनाया।
मेघ-मृदंगों की गंभीर थापों पर नभ झूम उठा,
दामिनि की दमकी मुस्कानों से अंबर का मुख चूम उठा।
मंद समीर मल्हार सुनाए, वन-वीणा झंकृत होती,
पल्लव-पल्लव स्वर बन गाता, डाली-डाली लय संजोती।
बूँदों ने मुक्ताफल बन-बन हरित वसन पर हार पिरोए,
तृण की पलक-पलक पर जैसे स्वर्णिम स्वप्न सलोने बोए।
मोर मुकुट में इंद्रधनुष का सप्तसुरों का रंग समाया,
पपीहे के पंचम स्वर ने अमृत-प्यासा गीत सुनाया।
कदंबों ने बाहें फैलाकर सावन का स्वागत गाया,
लताओं ने लज्जित हँसी से प्रिय का मधु-अभिनंदन पाया।
झरने वीणा-स्वर बन गूँजे, सरिताएँ स्वर-संगम गातीं,
शैल-शिखर मृदुल आलापों में अनहद की ध्वनि दोहरातीं।
भीगी माटी के उर से उठती सौंधी सुरभि सुहानी,
जन-जन के अंतर्मन में गूँजी प्रकृति-माता की वाणी।
धानों की हर बाली सुनहरी आशा की आरती उतारे,
कृषक-नयन में स्वप्न सजे फिर, श्रम के शुभ परिणाम सँवारे।
धुला क्षितिज, धुला मन-दर्पण, धुला हृदय का सारा क्लेश,
बूँद-बूँद में झलक रहा था सृष्टि-हृदय का दिव्य संदेश।
ऋतु वर्षा की आई, जीवन में नव राग जगाकर,
जड़ में चेतन, शुष्क हृदय में प्रेम-प्रवाह अमृत बरसाकर।
जो प्रकृति के स्वर को सुन ले, वही सत्य का गान सुनाता,
वर्षा केवल जल नहीं है, जीवन का उत्सव कहलाता।।
-सनातन मुकुंद
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