मेरा दोस्त
मुझे से छुट रहे हैं,
शहर आएं दो हाथ, कलम व आंख ,
सब कुछ ले के....
फिर से घर को लौट जा रहे हैं ,,
कितनी कर्जदार होंगी ए शहर
तुने मौत उसके हाथों में दे दिया
ए शहर तुझे से शिकायत है
उसे लौटा क्यों रही हो,
संघर्ष तो करने देती
ए रूम मालिक तुम से भी शिकायत है
क्या तुम अपने शहर के अधिनस्थ हो गये हो
आवो हवा में मरी मौजूदगी हो गये हो
आखिर कुछ तो बोलो,,
ए शिक्षक, संस्था हमे आप से शिकायत है
आधे दर्जन अंक फीस ले रहे हो
पढ़ाई के नाम पर आंदोलन व रीलबाजी कर रहे हो
साहब कुछ पढ़ा लो
क्यों कि मेरे दोस्त घर लौट रहे हैं,,
हां शायद साग सब्जी के ,
आटा चावल आलू के
सब के हिसाब करने आ गये,
दाम भी साढे,ढाई,सवा पढ़ने लिखने आ गये
मगर नहीं आई रिजल्ट के खाके में मेरा नाम,
शायद इसीलिए दोस्त अब घर लौट रहे हैं ,,
अब क्या होगा
घरबार में, गांव ज्वार में
वैसा ही होगा
जैसे
कुछ बदला ही नहीं हो,
मगर
त्योहार के,
मौसम,
उत्सव में
नौकरी के जंग लड़ना ही पड़ेगा
हर कोई पूछेगा कि
का बेटा शहर गये थे नौकरी नहीं लगा
पढ़ाई अच्छे से नहीं किये होगे,
राजमिस्त्री के नौकर बने गणित के पढे लिखे नौजवान
अपनी सहमति पे मूक चीखे देगा
पर कोई सुन नहीं सकता है।
किस्मत व खुद के गलती पे रोएगा
शायद यही भविष्य लौट रहे दोस्त का होएगा
शहर से जिन्दा कोई घर नहीं लौटता है
मरे शवों पे हर कोई आता है
मगर जिंदे होने पर कोई नहीं आता है।
-देव ऋषि
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