तिनके-तिनके जोड़-जोड़कर,
छप्पर एक बनाया था,
बड़ी लगन और मेहनत से,
बच्चों का कदम बढ़ाया था।
भूखे रहकर भी बच्चों को,
शिक्षा की नींव को रखी थी,
उज्ज्वल भविष्य के सपनों की,
एक दुनिया सजा रखी थी।
नहीं पता था प्रकृति एक दिन,
ऐसी विपदा लाएगी,
सजाकर रखी सपनों की दुनिया,
पल में बहा ले जाएगी।
विकट संकट की आँधी बनकर,
ब्रह्मपुत्र जब आई,
जन-धन सब कुछ बहा ले गई,
ऐसा कहर बरपाई।
घर-आँगन सब डूब गए,
खेत हुए वीरान,
आँखों के आगे उजड़ गया,
जीवन का अरमान।
मानव अपना सब कुछ खोए,
पशु-पक्षी भी न बच पाए,
कितनी माओं की सूनी गोदें,
कितने माँ बाप न बच पाए।
जहाँ कभी बच्चों की किलकारी,
सारे आँगन में गूँजती थी,
वहीं आज बस चीख-पुकार है,
हर आँख अश्रु से भीगती थी।
फिर भी यह मानव बिन हारे,
हिम्मत का दीप जलाएगा,
तिनका-तिनका जोड़कर फिर से,
अपने घर को बनाएगा।
जीवनदायिनी ब्रह्मपुत्र जो,
तेरा रूप विकराल हुआ,
तेरी लहरों में ही बहकर,
मानव का साहस लाल हुआ।
जो उजड़े हैं, उनको फिर से,
नई सुबह का साथ मिले,
सूनी आँखों के भीतर फिर से,
जीने का विश्वास खिले।
प्रकृति के इस भीषण प्रकोप में,
जो अपनों से बिछड़ गए,
उन सबकी पीड़ा को नमन है,
जो जीवन से ही लड़ गए।
-सूबा लाल "अंजाना"
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