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न ढोलक बजी, न बजे नगाड़े,
न लड्डू बँटे, न लोरी के सुर उठे,
छाई चहुँ ओर उदासी
मानो आ गई है
कोई अनचाही ।

पलती रही, बढ़ती रही
सहेजती रही...
निर्दोष स्वप्न,निर्दोष रिश्ते
बेगानों का लिये एहसास
आखिर थी तो पराया धन ।

वह समय भी आया
जब पराये धन को
उसके अपनों ने
दुनिया की नजरों से बचाकर
सौंप दिया बेगानों को ।

नई जगह, नया रूप
कुछ बंदिश,कुछ उन्मुक्तता
लक्ष्मी कहलाई, धात्री बनी,
बहू बनी, पत्नी बनी,
पर नहीं मिला आशियाना ।

किलकारियों से गूंजा घर आंगन,
सार्थक हुआ मातृत्व
दूर हुआ परायेपन का एहसास
जिस ममता के लिये तरसी वह
उस ममता से उसे सिंचित किया ।

उड़ता देख नीलाम्बर में
तन-मन से होकर तृप्त
ढेरों आशीषों के संग
नित सफलता की
कामना करती रही ।

आया वह दिन भी
जो समय दिया था
पहले निज अंश को
अब अंश के अंश पर
न्यौछावर करने लगी ।

जीवन के अंतिम पड़ाव पर
ममता का छीजता दामन लिये
विस्मित खड़ी है
न पिता,न पति, न बच्चे
सबने उसे इस्तेमाल ही किया।
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5 दिन पहले

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