किसी समन्दर की लहर की तरह,
टकरा कर किनारे से,
लौट जाउंगा इक शाम,
पर बहा ले जाउंगा अपने संग,
उस रेत को, उन यादों को,
जिसे अपनी मुट्ठी में समेट न सका...
चाहत तो बहुत है,
उस रेत को सीने से लगा रखने की,
जो है मेरा अस्तित्व,मेरा निशां,
पर कौन रोक सका है,
उस बहाव को
लाख जतन करने पर भी ...
जतन तो था कि,
थम जाउं किसी किनारे पर,
या फिर लीन हो जांउ,
उस समुन्दर की उस गहराई में,
जहां से उपजी थी यह लहर,
कभी भी न लौटने के लिए...
कितना कठिन सफर है ये,
उस रेत से उभर कर,
फिर पीछे मुड़ने का,
पद चिन्हों को मिटाते हुए,
उस घर वापस जाने का,
जहां मैं मैं ही न रहूं ...
-सुशील कुमार अदलखा ...
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