ओ.पी. नैयर यानि ओमकार प्रसाद मदनगोपाल नैयर। एक ऐसा संगीतकार जिसे 'ताल का बादशाह' कहा जाता था। 1926 में लाहौर में जन्मे ओ.पी. नैयर ने 1952 में 'आसमान' फ़िल्म से अपना करियर शुरू किया था। लेकिन उनको राष्ट्रीय पहचान मिली थी गुरुदत्त की फ़िल्मों आरपार, मिस्टर एंड मिसेज़ 55, सीआई डी और तुम सा नहीं देखा से। पेश है ओ.पी. नैयर के संगीत से सजे 5 चुनिंदा गाने-
1956 में बनी फिल्म 'सी.आई.डी.' का गीत-'ले के पहला-पहला प्यार...' बहुत मशहूर हुआ। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत को संगीत से संवारा था ओ.पी. नैयर ने और आवाज़ दी थी- मोहम्मद रफ़ी, आशा भोंसले और शमशाद बेगम ने।
ले के पहला पहला प्यार, भर के आँखों में ख़ुमार
जादू नगरी से आया है कोई जादूगर
ले के पहला पहला प्यार, भर के आँखों में ख़ुमार
जादू नगरी से आया है कोई जादूगर
मुखड़े पे डाले हुए ज़ुल्फों की बदली
चली बलखाती कहां,रुक जा ओ पगली
हाय नैनों वाली तेरे द्वार
ले के सपने हजार
जादू नगरी से आया है कोई जादूगर
शमशाद बेगम की ही आवाज़ में 1952 में बनी फिल्म 'आर- पार' का गीत-कभी आर- कभी पार लागा तीरे नज़र' भी बहुत मशहूर है। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत का भी संगीत ओ.पी. नैयर ने ही तैयार किया था।
कभी आर- कभी पार लागा तीरे नज़र
सैंया घायल किया रे तूने मोरा जिगर
कितना संभाला बैरी, दो नैनों में खो गया
देखती रह गयी मैं तो, जिया तेरा हो गया
दर्द मिला ये जीवन भर का
मारा ऐसा तीर नज़र का
लूटा चैन, क़रार
कभी आर कभी पार...
फिल्म 'तुम सा नहीं देखा' 1957 में बनी थी। इस फिल्म का गीत -' सर पर टोपी लाल, हाथ में रेशम का रूमाल' आज भी लोग गुनगुनाते रहते हैं। गीतकार थे- मजरूह सुल्तानपुरी, आवाज़ थी मोहम्मद रफ़ी और आशा भोसले की और संगीतकार थे - ओ.पी. नैयर ।
सर पे टोपी लाल, हाथ में रेशम का रूमाल, हो ! तेरा क्या कहना
गोरे-गोरे गाल, गाल पे उलझे-उलझे बाल, हो ! तेरा क्या कहना
मेरा दिल ओ जान-ए-जां, चुरा के चली कहाँ, नशे में भरी-भरी
चुराऊँ मैं दिल तेरा, जिगर भी नहीं मेरा, उमर भी नहीं मेरी
बहकी-बहकी चाल, चाल हाय, लचके जैसे डाल, हो, तेरा क्या कहना
सर पे टोपी ...
हो, ये क्यों दिल पे हाथ है, वो क्या ऐसी बात है, हमें भी बताइए
भला इतनी दूर से, कहूँ क्या हुज़ूर से, मेरे पास आइए
हो हो के बेहाल बालमा, ये सतरँगी चाल, हो ! तेरा क्या कहना
गोरे गोरे गाल ...
फिल्म 'फिर वही दिल लाया हूं' सन 1963 में बनी थी। वैसे तो इसके सारे गाने सुपरहिट हुए थे लेकिन यहां किसी एक गीत का संदर्भ देना है, तो प्रस्तुत है 'नाज़नीं बड़ा रँगीं है वादा तेरा....'। गीत के बोल थे मजरूह सुल्तानपुरी के, संगीत- ओ.पी. नैयर का और आवाज़ थी आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी की।
दूर बहुत मत जाइये, लेके क़रार हमारा
ऐसा न हो, कोई लूट ले, राह में प्यार हमारा
पास रहो या दूर तुम, तुम हो साथ हमारे
देंगे गवाही पूछ लो, ये ख़ामोश नज़ारे
नाज़नीं बड़ा रँगीं है वादा तेरा
ओ हसीं ! है किधर का इरादा तेरा !
आँख मुड़ती हुई, ज़ुल्फ़ उड़ती हुई
फ़ासला क्यों है ज़्यादा तेरा !
ओ हमदम मेरे, खेल न जानो चाहत के इक़रार को
जान-ए-जहाँ, याद करोगे, इक दिन मेरे प्यार को....
इक परदेशी मेरा दिल ले गया...फिल्म फागु का गीत है। यह फिल्म 1958 में बनी थी। गीतकार थे-क़मर जलालाबादी, संगीतकार- ओ. पी. नैयर और आवाज़ थी- आशा भोसले औल मोहम्मद रफ़ी की-
आशा: इक परदेशी मेरा दिल ले गया
जाते-जाते मीठा-मीठा ग़म दे गया
रफ़ी: कौन परदेशी तेरा दिल ले गया
मोटी-मोटी अंखियों में आंसू दे गया
रफ़ी: ढूँढ रहे तुझे लाखों दिल वाले
कर दे ओ गोरी ज़रा आँखों से उजाले
आशा: आँखों का उजाला परदेसी ले गया
जाते जाते मीठा मीठा ग़म दे गया
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