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गुलज़ार के शब्दों में बेटी की विदाई: मुड़ के ना देखो दिलबरो… दिलबरो

Film raazi song Mud ke na dekho dilbaro
                
                                                         
                            
विदाई शब्द स्वयं में जितनी करुणा लिए हुए है वो शायद विश्व भर के किसी भी करुण-रस के काव्य में भी नहीं हो सकती। जब एक बेटी विदा होती है तो उसकी रुख़सती का जो वज्र-प्रहार एक पिता के ह्र्दय पर होता है वो शायद ही किसी और रिश्ते को महसूस होता होगा क्योंकि यह नैसर्गिक है कि एक पुत्री सबसे ज्यादा अपने पिता के नज़दीक होती है। विदाई के समय जब सब बारी-बारी बेटी को गले लगाकर रोते हैं, उस समय एक पिता पीछे खड़ा आंसुओं के सैलाब को गले में बांधने की विफ़ल कोशिश करता है। एक बेटी होने के नाते ये मैं बेहतरी से समझ सकती हूं जब पिता एक पल तो बिटिया की शादी के ख़्वाब देख खुश होते हैं और दूसरा यह सोचकर रुआंसे हो जाते हैं कि दिल का टुकड़ा एक पल में ही पराया भी हो जाएगा।
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राज़ी’...

2 वर्ष पहले

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