विदाई शब्द स्वयं में जितनी करुणा लिए हुए है वो शायद विश्व भर के किसी भी करुण-रस के काव्य में भी नहीं हो सकती। जब एक बेटी विदा होती है तो उसकी रुख़सती का जो वज्र-प्रहार एक पिता के ह्र्दय पर होता है वो शायद ही किसी और रिश्ते को महसूस होता होगा क्योंकि यह नैसर्गिक है कि एक पुत्री सबसे ज्यादा अपने पिता के नज़दीक होती है। विदाई के समय जब सब बारी-बारी बेटी को गले लगाकर रोते हैं, उस समय एक पिता पीछे खड़ा आंसुओं के सैलाब को गले में बांधने की विफ़ल कोशिश करता है। एक बेटी होने के नाते ये मैं बेहतरी से समझ सकती हूं जब पिता एक पल तो बिटिया की शादी के ख़्वाब देख खुश होते हैं और दूसरा यह सोचकर रुआंसे हो जाते हैं कि दिल का टुकड़ा एक पल में ही पराया भी हो जाएगा।
राज़ी’...
जीवन के सबसे गहरे भावों को शब्दों से नहीं बांधा जा सकता, उन्हें संवेदनाओं के उस वेग के साथ जीया जाता है जहां हर अक्षर, हर आवाज़ मौन हो जाती है, सिर्फ़ मन ही होता है जो बोलता है और महसूस करता है। इसकी पुष्टि वो पिता ही कर सकता है जिसने हाल ही में अपनी बेटी की शादी की है, यद्यपि ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ सरीखे गाने भी खूब हुए जिसे सुनकर बैठे-बैठे दिल डूब जाए। इसके बाद मुझे मेरे होश में दूसरा ऐसा गाना हालिया रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘राज़ी’ में सुनने को मिला।
यूं तो आजकल के गानों को सुनने का दिल नहीं करता लेकिन अगर कहीं ऐसे बोल सुनाई दे जाएं जो आपको निकट भविष्य के सबसे भावुक क्षणों की अनुभूति वर्तमान में ही करवा दें तो वहां कान के साथ-साथ दिल भी ठहर जाएगा। आलिया भट्ट अभिनीत फ़िल्म राज़ी का गाना…
ऊंगली पकड़ के तूने चलना सिखाया था ना दहलीज़ ऊंची है ये पार करा दे
बाबा मैं तेरी मलिका...
गाने की पहली दो पंक्तियां ही स्पंदित कर देती हैं, पापा ने कब ऊंगली पकड़कर चलना सिखाया वो तो स्मृति में नहीं है लेकिन मानसिक और भावुक तौर पर वो आज भी ऊंगली पकड़कर मुझे गिरने से बचा रहे हैं इसका मुझे पूरा भान है। ये गाना पहली बार में ही ज़हन में उतर गया था और पहली ही बार में ये ख़याल भी कौंधा कि वह कौन गीतकार हैं जिन्होंने जीवन की इस रस्म को शब्दबद्ध करने का हौंसला किया है, जैसे शब्दबेधी विद्या हर धनुर्धर को नहीं आती, ठीक वैसे ही शब्दों से आत्मा झकझोंर देने की विद्या गुलज़ार को आती है। गाने के बोल हैं
ऊंगली पकड़ के तूने चलना सिखाया था ना
दहलीज़ ऊंची है ये पार करा दे
बाबा मैं तेरी मलिका
टुकड़ा हूं तेरे दिल का
एक बार फिर से दहलीज़ पार करा दे
गुलज़ार कह रहे हैं कि...
इस गाने की मेकिंग की एक वीडियो यूट्यूब पर है जिसमें गुलज़ार कह रहे हैं कि, “बेटी के लिए वो जहां पली-बढ़ी है वो दहलीज़ पार करना आसान नहीं है, सारे रिश्ते पीछे छोड़कर जा रही है” गुलज़ार साहब इस वीडियो में अपनी बेटी मेघना के साथ बैठे हैं जो इस फ़िल्म की निर्देशक भी हैं। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने यह गाना अपने वास्तविक जीवन के अनुभव को आत्मसात कर लिखा है। हर बेटी अपने पापा के लिए राजकुमारी है जैसा कि अंग्रेज़ी में भी कहते हैं कि “पापा’ज़ प्रिंसेज़”, इसलिए गीतकार गुलज़ार ने यहां भी बेटी को मलिका बनाया है।
शंकर-एहसान- लॉय की धुन पर इसे हर्षदीप कौर, विभा सराफ़ और शंकर महादेवन ने गाया है और ग़ज़ब का मेल हुआ है इन सबका जो यह नग़्मा तैयार हो सका।
बेटियां जो ब्याही जाएं मुड़ती नहीं हैं...
बेटी के लिए प्रयोग हुआ फ़सल का बिंब यहां अद्भुत है। जैसे फ़सल एकबार काटने पर नहीं आती, ठीक वैसे ही बेटियां भी शादी के बाद फिर वापस नहीं आतीं, और अगर ऐसा ही है तो इस दर्द को भी पिता अगर कम कर सकें तो कर दें।
फ़सलें जो काटी जाएं उगती नहीं हैं
बेटियां जो ब्याही जाएं मुड़ती नहीं हैं
ऐसी विदाई हो तो लम्बी जुदाई हो तो
दहलीज़ दर्द की भी पार करा दे
बाबा मैं तेरी मलिका
मेरे दिलबरों…
आगे पढ़ें इस गाने के बोल और सुनें इस वीडियो के साथ...
अमर उजाला एप इंस्टॉल कर रजिस्टर करें और 100 कॉइन्स पाएं
केवल नए रजिस्ट्रेशन पर
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही
अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज आपके व्हाट्सएप पर
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X