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इश्क़ की कचहरी- ओ रात के मुसाफिर, चँदा जरा बता दे 

Mohammad Rafi
                
                                                         
                            रोमांटिक युगल गाने की इतनी भोली जिरह कम ही देखने को मिलती है। मैं बात कर रहा हूँ 'मिस मैरी' फिल्म के 'ओ रात के मुसाफिर चँदा जरा बता दे' गाने की। रफी और लता द्वारा गाया यह गाना प्रेम की उस अवस्था को बयां करता है जब प्रेमी-प्रेमिका, एक दूसरे के प्रति पनप रहे प्रेम का 'कॉग्निजेंस' या यूं कहें कि संज्ञान नहीं ले पाते। और फिर इश्क़ के लिए एक अदालत बैठती है। इस अदालत के जज होते  हैं 'रात के मुसाफिर' - चाँद।
                                                                 
                            

ओ रात के मुसाफिर 
चँदा जरा बता दे 
मेरा क़ुसूर क्या है
तू फैसला सुना दे

है भूल कोई दिल की

दरअसल यह एक ऐसी दिलचस्प स्थिति का गीत है जो नायक और नायिका के बीच चल रहे सहज और सामान्य रिश्ते में आ रहे बदलाव की वजह से पैदा हो रहा है। 

यह परिवर्तन एक दूसरे से बन रही नई अपेक्षाओं का है, पनप रहे प्रेम का है। ऐसे में नायक नायिका के प्रकट भाव को ही समझ पाने में सक्षम नहीं है। उसे समझ नहीं आता कि उसकी इसमें क्या 'भूल है', यह भूल  'आँखों' की है या उसके दिल की।

 वह अपने ज्ञानेंद्रीय में ही बिखरने लगता है। नायक को अपना दिल और अपनी आँखें उसके अपने अस्तित्व से अलग लगने लगती है।

है भूल कोई दिल की
आँखों की या खता है
 कुछ भी नही तो मेरा 
मुझसे फिर क्यों कोई खफा है
मंजूर है वो मुझको 
जो कुछ भी तू सज़ा दे 
मेरा क़ुसूर क्या है
तू फैसला सुना दे
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है भूल कोई दिल की

एक वर्ष पहले

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