रोमांटिक युगल गाने की इतनी भोली जिरह कम ही देखने को मिलती है। मैं बात कर रहा हूँ 'मिस मैरी' फिल्म के 'ओ रात के मुसाफिर चँदा जरा बता दे' गाने की। रफी और लता द्वारा गाया यह गाना प्रेम की उस अवस्था को बयां करता है जब प्रेमी-प्रेमिका, एक दूसरे के प्रति पनप रहे प्रेम का 'कॉग्निजेंस' या यूं कहें कि संज्ञान नहीं ले पाते। और फिर इश्क़ के लिए एक अदालत बैठती है। इस अदालत के जज होते हैं 'रात के मुसाफिर' - चाँद।
ओ रात के मुसाफिर
चँदा जरा बता दे
मेरा क़ुसूर क्या है
तू फैसला सुना दे
दरअसल यह एक ऐसी दिलचस्प स्थिति का गीत है जो नायक और नायिका के बीच चल रहे सहज और सामान्य रिश्ते में आ रहे बदलाव की वजह से पैदा हो रहा है।
यह परिवर्तन एक दूसरे से बन रही नई अपेक्षाओं का है, पनप रहे प्रेम का है। ऐसे में नायक नायिका के प्रकट भाव को ही समझ पाने में सक्षम नहीं है। उसे समझ नहीं आता कि उसकी इसमें क्या 'भूल है', यह भूल 'आँखों' की है या उसके दिल की।
वह अपने ज्ञानेंद्रीय में ही बिखरने लगता है। नायक को अपना दिल और अपनी आँखें उसके अपने अस्तित्व से अलग लगने लगती है।
है भूल कोई दिल की
आँखों की या खता है
कुछ भी नही तो मेरा
मुझसे फिर क्यों कोई खफा है
मंजूर है वो मुझको
जो कुछ भी तू सज़ा दे
मेरा क़ुसूर क्या है
तू फैसला सुना दे
दिल पे किसी को अपने काबू नहीं रहा है
ठीक यही वक्त है जब नायिका का पक्ष भारी हो जाता है बल्कि स्क्रीन पर तो नायक को अचानक यह लगता है कि- उसके गले से उसकी बात स्त्री स्वर में क्यों निकलने लगी।
इसकी वजह यह कि नायक के दिल और आँखों की गलती को नायिका ने पकड़ लिया और ठीक उन्हीं संवेदनाओं से वह उसके दोष का प्रमाण दे देती है -" ये राज़ मेरे दिल से आँखों ने ही कहा है, आँखों ने है जो देखा, दिल किस तरह भुला दे "।
इसलिए शुरुआत में जब नायिका दिल से अपनी बात शुरू करती है तो उसे यह गलतफहमी होती है कि उसी (नायक) की बात हो रही है। यह मुग्धता की स्थिति को ही बयान करता है।
दिल पे किसी को अपने
काबू नहीं रहा है
ये राज़ मेरे दिल से आँखों ने ही कहा है
आँखों ने है जो देखा
दिल किस तरह भुला दे
मेरा क़ुसूर क्या है
तू फैसला सुना दे
अमूर्त भावों और संवेदनाओं की हारी हुई इस लड़ाई के लिए नायक की आखिरी कोशिश आसमान के चाँद को एक पल के लिए जमीन पर बुलाने के रूप में दिखाई देती है। यह एक तरह से छल का बहुत निष्कपट स्वरूप ही है कि जब- जिरह हार गए तो भौतिक रूप से मिल कर ही कुछ सिफ़ारिश पेश कर सकें।
ओ चाँद आसमान के
दम भर ज़मीन पे आ जा
ठीक इसी वक़्त नायिका का तंज़ होता है 'भुला हुआ है राही, तू रास्ता दिखा जा'। भावनाओं की ऐसी लड़ाई में जीत अंततः प्रेम की होती है। दोनों के सुर एक होते हैं और अपने बीच पल रहे इस अजनबीयत को दोनों सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।
भूला हुआ है राही
तू रास्ता दिखा जा
तू रास्ता दिखा जा
भटकी हुई है नैया
साहिल इसे दिखा दे
मेरा क़ुसूर क्या है
तू फैसला सुना दे
ओ रात के मुसाफिर
चँदा जरा बता दे
मेरा क़ुसूर क्या है
तू फैसला सुना दे
आँखों और दिल के इस चतुष्फलकीय गतिकी को राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा है। मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आरंभिक आवाज और राजेन्द्र कृष्ण के लिखे गीत में मोम जैसा संगीत भरा था हेमंत दा ने। पर्दे पर नायक के रूप में जेमेनी गणेशण हैं और नायिका के रूप में मीना कुमारी।
सत्यम कुमार सिंह
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है भूल कोई दिल की
एक वर्ष पहले
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