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मैं लिखूंगा गीत, तुम गाना, अमर हो जाएंगे हम

मैं लिखूँगा गीत, तुम गाना, अमर हो जाएंगे हम
                
                                                         
                            यदि होता किन्नर नरेश मैं
                                                                 
                            
राज महल में रहता,
सोने का सिंहासन होता
सिर पर मुकुट चमकता।

बंदी जन गुण गाते रहते
दरवाजे पर मेरे,
प्रतिदिन नौबत बजती रहती
संध्या और सवेरे।

बचपन में प्रवेशिका में और मेरी पीढ़ी के बच्चे उनकी इस कविता के साथ उनकी तमाम अन्य कविताएं पढ़ते, गाते- गुनगुनाते और दुहराते। तितली रानी तितली रानी/ नाच रही कैसी मनमानी, हम सब सुमन एक उपवन के। सूरज सा चमकूं मैं चंदा सा दमकूं मैं मेरी अभिलाषा है....कितने मोहक गीत हुआ करते। किसने सोचा था जिसे मास्टर साब पढ़ाते हैं उसके भाव बताते हैं, उन रचनाओं के रचयिता से कभी भेंट होगी। पर यह संभव हुआ जब उच्च शिक्षा के लिए गांव से लखनऊ आया।  आगे पढ़ें

एक वर्ष पहले

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