यदि होता किन्नर नरेश मैं
राज महल में रहता,
सोने का सिंहासन होता
सिर पर मुकुट चमकता।
बंदी जन गुण गाते रहते
दरवाजे पर मेरे,
प्रतिदिन नौबत बजती रहती
संध्या और सवेरे।
बचपन में प्रवेशिका में और मेरी पीढ़ी के बच्चे उनकी इस कविता के साथ उनकी तमाम अन्य कविताएं पढ़ते, गाते- गुनगुनाते और दुहराते। तितली रानी तितली रानी/ नाच रही कैसी मनमानी, हम सब सुमन एक उपवन के। सूरज सा चमकूं मैं चंदा सा दमकूं मैं मेरी अभिलाषा है....कितने मोहक गीत हुआ करते। किसने सोचा था जिसे मास्टर साब पढ़ाते हैं उसके भाव बताते हैं, उन रचनाओं के रचयिता से कभी भेंट होगी। पर यह संभव हुआ जब उच्च शिक्षा के लिए गांव से लखनऊ आया।
लखनऊ विश्वविद्यालय में बी.ए. में दाखिला लिया तो कुछ ही दिनों में सहपाठी विनोद कुमार माहेश्वरी से परिचय हुआ। लिखने पढ़ने की रुचियों के कारण वे निकट आए। बातों ही बातों में पता चला वे बच्चों के कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी के पुत्र हैं। यह हमारे लिए गौरव की बात थी। माहेश्वरी जी उन दिनों लिटरेसी हाउस में निदेशक थे। आलमबाग में रहते थे। फिर एम.ए. करते करते पता नहीं क्या सूझा कि माहेश्वरी जी के साहित्य पर काम किया जाए। प्रस्तावना बनी। फिर काम शुरू हुआ। तब तक वे सेवानिवृत्त होकर आगरा जा चुके थे।
भाई डॉ. ओंकार प्रसाद जी के यहां कुछ दिन रहे। फिर उनका अपना घर। दोनों जगह जाना हुआ। फिर किताब द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी: सृजन एवं मूल्यांकन 1984 में तैयार हो गयी तो समस्या आई कि कौन छापेगा। पर यह भी संभव हुआ। शिक्षा विभाग के यत्किंचित अनुदान से 'किताबघर प्रकाशन' के सत्यव्रत शर्मा जी ने उसे 1985 में छापा।
किसी भी बाल साहित्यकार पर आलोचना की यह पहली किताब थी। विद्यानिवास मिश्र ने इसकी बहुत आत्मीय भूमिका लिखी थी। उसके बाद तीन खंडों में द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी रचनावली भी डॉ. विनोद माहेश्वरी के साथ संपादित की जिसका लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने किया। दोनों गांधीवादी चिंतक। साथ मिले तो शर्मा जी की आगरा की यादें उभरीं। खूब गप्प किया दोनों लोगों ने राष्ट्रपति भवन में।
आज अचानक उनके साथ हुई अनेक बातचीत की याद आ रही है। वे मेरी पांडुलिपि देख कर खुश होते थे। उनके साथ कितना कितना पत्राचार हुआ। अनेक पत्र उनके मेरे पास आज भी सुरक्षित हैं। मेरे पहले की दो पीढ़ियों ने उनकी बाल कविताएं किसी न किसी स्तर पर पढ़ी हैं। आज भी उनकी कविताएं पाठ्यक्रमों में हैं। माहेश्वरी जी ने बाल कविताओं के अलावा भी प्रभूत साहित्य लिखा है। 'सत्य की जीत' व 'क्रौंच वध' दो प्रबंध काव्य। दो दर्जन बाल गीत संग्रह। गीतगंगा और कई कविता संग्रह । हालांकि विनम्रतावश वे यही कहते हैं- 'मेरी कविता का हर बोल तुम्हारा है। पर कहीं न कहीं गीत के साथ पाठ का रिश्ता है लिहाजा उसके वशीभूत होकर वे कहते हैं ---मैं लिखूंगा गीत तुम गाना अमर हो जाएंगे हम।'
बालगीतों के क्षेत्र में उनके सुयश को लांघने वाला रचनाकार उनके समकालीनों में कोई नहीं। उनकी कविताएं सदैव होठों पर रहती हैं। उनके गीतों में अनेक सीखें भी रची बसी मिलती हैं। जैसे-
सोच न कर दुर्दिन पड़ने पर
सब मुंह मोड़ लिया करते हैं
अपने आंसू भी आंखों को
रोती छोड़ दिया करते हैं।
एक वक्त था जब बाल साहित्य को लेकर बड़े लेखकों में उपेक्षा का भाव था, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने इस दिशा में आगे बढ़ कर बाल साहित्य लेखन की कमान संभाली। हिंदी बाल साहित्य के इस अप्रतिम कवि को कौन नहीं जानता। बाल मनोविज्ञान के दक्ष द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जन्म दिसंबर 1916 में आगरा जनपद के रोहता गांव में हुआ था। यह गांव आगरा से दक्षिण की ओर 8 किमी की दूरी पर है। माहेश्वरी जी के पूर्वज राजस्थान में साँभर झील के आगे कुचामन कस्बे के निकट रसीदपुरा गाँव से काफी पहले ग्वालियर में बस गए थे।
उनके पितामह कालूराम थे तथा पिता का नाम प्रेमसुख था। प्रेमसुख के तीन पुत्रों में माहेश्वरी जी सबसे छोटे थे। खेती-किसानी से जुड़े परिवार के बावजूद जैसे तैसे माहेश्वरी जी ने विभिन्न गुरुजनों एवं हितचिंतकों के सहयोग से एम.ए., एलटी तक की शिक्षा ग्रहण की। बाद में वे उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग से जुड़े और शिक्षा प्रसार अधिकारी, पाठ्य पुस्तक अधिकारी, अतिरिकक़्त सचिव, माध्यमिक शिक्षा परिषद, प्राचार्य गवर्नमेट सेंट्रल फेडागाजिकल इन्स्टीट्यूट, इलाहाबाद तथा उप निदेशक जैसे पदों पर रहे। सेवानिवृत्ति के बाद वे आलमबाग, लखनऊ की साक्षरता संस्था लिटरेसी हाउस के निदेशक भी रहे।
माहेश्वरी जी का रचना संसार त्रि-आयामी है। पहली कोटि में उनके काव्य एवं खंड काव्य आते हैं। दूसरी कोटि में उनका बाल साहित्य है। तीसरी कोटि में उनका शैक्षिक एवं नव साक्षरोपयोगी साहित्य है। माहेश्वरी जी के पहले कविता संग्रह 'दीपक' का प्रकाशन 1949 में हुआ। उसके बाद 'ज्योतिकिरण', 'फूल और शूल', 'शूल की सेज', 'गीत गंगा' तथा 'शंख और बाँसुरी' शीर्षक संग्रह प्रकाश में आए।
इसके अतिरिक़्त उन्होंने दो खंड काव्य भी लिखे। 'क्रौंच वध' एवं 'सत्य की जीत' जो एक लंबे अरसे तक हाईस्कूल के पाठ्यक्रम में साम्मिलित भी रहे। माहेश्वरी जी की कविताओं में एक गहरी आत्मोन्मुखता है। प्रकृति और मानव को उन्होंने अत्यंत तादाम्य भाव से ग्रहण किया है। कविता कवि के मन से फूटती है।
कवि के भीतर की अनुभूति ही कहीं कविता की शक़्ल ग्रहण करती है। वास्तव में कवि अपनी कविता के माध्यम से स्वगत निवेदन करता है। वह कविताओं में खुलता है। अफने आत्मकथ्य को कवि कितनी ही तरह से, कितनी ही बार कहता है। माहेश्वरी जी की ऐसी अनेक कविताएं हैं, जो उनके अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति होते हुए भी साधारणीकरण का भाव जगाती हैं।
माहेश्वरी जी के रचना संसार में ऐसी कविताओं की संख्या ज्यादा है जो जीवन के राग-विराग से संबंधित हैं। गाँधीवादी सोच के कारण उनके यहां सत्य के प्रति, मनुष्यता के प्रति सबल आग्रह मिलता है। वे राष्ट्रीय भावधारा के उन कवियों में हैं, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए गए संघर्ष के साक्षी रहे हैं। उनकी कविताओं में लोकमंगल की भावना का समावेश मिलता है। उनके लेखन की सादगी ने हम लोगों की पाठकीय जिज्ञासाओं को इतना उमगाया है कि कई बार मन हुआ उनसे पूछूं कि उनके बाल गीतों के इस अप्रतिम आकर्षण का रहस्य क्या है।
उन्हें बताऊं कि यदि होता किन्नर नरेश मैं जैसी कविताओं में जो स्वप्न और सौंदर्यबोध निहित है, उनकी ओर बचपन से लेकर अब तक हम कितना आकॄष्ट होते आए हैं। यह गीत अब उनकी रचना भर नहीं है, आगे चलकर कितने ही बच्चों के सपनों के अनुभव का अभिन्न अंग बना है।
बालगीत के क्षेत्र में उन्होंने प्रभूत कार्य किया है। आजादी के बाद गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव में उनका पहला बालगीत संग्रह 'कातो और गाओ' 1949 में प्रकाशित हुआ। 'कातो और गाओ' के बाद प्रकाशित उनके बालगीतों की एक लंबी श्रॄंखला है- लहरें, बढ़े चलो, बुद्धि बड़ी या बल, अपने काम से काम, माखन मिश्री, हाथी घोड़ा पालकी , सोने की कुल्हाड़ी, अंजन खंजन, सोच समझ कर दोस्ती करो, सूरज - सा चमकूं मैं, हम सब सुमन एक उपवन के, सतरंगा फूल, प्यारे गुब्बारे, हाथी आता झूम के, बाल गीतायन, आई रेल आई रेल, सीढ़ी सीढ़ी चढ़ते हैं, हम हैं सूरज चाँद सितारे, जल्दी सोना जल्दी जगना, मेरा वंदन है, बगुला कुशल मछुआ, नीम और गिलहरी, चाँदी की डोरी, ना-मौसी-ना, चरखे और चूहे, धूप और धनुष । इसके अतिरिक़्त श्रम के सुमन , बाल रामायण तथा शेर भी डर गया कथा-कहानी की पुस्तकें हैं।
माहेश्वरी जी को उनके साहित्यिक अवदान के लिए अनेक पुरस्कार मिले। वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा उन्हें बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार तथा ताम्रपत्र उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई से ग्रहण किया। 1992 में उन्हें पुनः उ.प्र.हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा बाल साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च पुरस्कार बाल साहित्य भारती से सम्मानित किया गया।
इन सम्मानों और पुरस्कारों के बावजूद वे कभी इसके मुखापेक्षी नहीं रहे। उनके अनेक गीतों के मुखड़े जन जागरण और सांप्रदायिक सद्भाव के विज्ञापन के रूप में प्रसारित किए गए और सराहे गए हैं। उनके बालगीत की पहली पंक्ति ''हम सब सुमन एक उपवन के ''को एक समय उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कौमी एकता का बोध जगाने वाली विज्ञापन पंक्ति के रूप में इस्तेमाल किया गया जिसके होर्डिंग लखनऊ तथा बड़े शहरों में देखे जा सकते थे। बाल साहित्य को माहेश्वरी जी का योगदान निश्चय ही अप्रतिम है जिसे सदैव याद किया जाता रहेगा।
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एक वर्ष पहले
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