डॉ.ओम निश्चल
शायरी और किस्सागोई से लेकर फिल्म निर्माण, पटकथा-संवाद लेखन व निर्देशन तक गुलज़ार का एक बड़ा कारोबार फैला है लेकिन यह कारोबार अभी फिल्म दुनिया की बाजारवादी माँग और आपूर्ति का संसाधन नहीं बना है। वह पूरी तौर पर अदबी और रचनात्मक है। गुलजार का होना यह बताता है कि उनकी शायरी की शुचिता फिल्म दुनिया की कारोबारी समझ के बावजूद कायम है।
उनके प्रशंसक बेशुमार हैं, उनके गीतों-नज़्मों को जहाँ लाखों करोड़ों लोगों की मुहब्बत हासिल है, कविता प्रेमियों को भी उसने अपने भाव-संसार और अंदाज़-ए-बयाँ से प्रभावित किया है। उन्होंने अपनी शख़्सियत से यह जताया है कि एक सच्चा कवि रोजी-रोटी से समझौता करता हुआ भी अदब के लिए अपने दिल में एक खास जज़्बा रखता है। गुलज़ार ने फिल्मी गीतों से लेकर शायरी और नज़्मों के समानांतर सफ़र में अपने कवित्व की अनूठी सौगात से लोगों को नवाज़ा है।
हाल के बरसों में गुलज़ार की शायरी के कई नए कलेक्शन आए। पंद्रह पाँच पचहत्तर, कुछ तो कहिए और पाज़ी नज़्में । 'पंद्रह पाँच पचहत्तर' आधुनिक उर्दू कविता में मील का पत्थर है। अपने सीधे-सहज गीतों में वे जितना मुखर होकर मानवीय अनुभूतियों को करीब से छूते हैं, अपनी नज़्मों में वे आधुनिक संवेदना की गहराइयों में उतरते हुए लफ़्ज़ों को नए मानी देते हैं। उन्हीं का कहना है- 'मैंने काल को तोड़ के लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया।' पंद्रह खंडों में पाँच-पाँच कविताओं का यह संग्रह कुल पचहत्तर कविताओं का एक ऐसा गुलदस्ता है जो पचहत्तर पार गुलज़ार के जीवन और अनुभवों के अनेक शेड्स उजागर करता है। गुलज़ार की चित्रकारी के भी नायाब नमूने यहाँ पन्ने दर पन्ने पिरोए गए हैं जिन्हें निहार कर आँखों को एक रचनात्मक तृप्ति मिलती है। मुझे आईआईसी दिल्ली के एक जलसे की याद है जब पाकिस्तान के एक शायर ने अपनी ग़ज़ल के एक मिसरे में उन्हें पिरोते हुए कहा था-
देखकर उनके रुख़्सार-ओ-लब यकीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी।
'यार जुलाहे' (गुलज़ार) की भूमिका में यतींद्र मिश्र ने लिखा है - 'इच्छाएँ, सुख, यथार्थ, नींदें, सपने, जिज्ञासा, प्रेम, स्मृतियाँ और रिश्तों की गुनगुनाहट को उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में इतने करीने से बुना गया है कि हमेशा यह महसूस होता है कि वह किसी नेक जुलाहे के अंतर्मन के तागे से बुनी गई हैं। इसमें संदेह नहीं कि गुलज़ार की नज़्मों-कविताओं में कविता और शायरी की सदियों पुरानी परंपरा सांस लेती है और वे हर बार अपनी अनुभूतियों को भाषा और संवेदना का नया जामा पहनाते हैं।'
इन नज़्मों में पिरोए गए बिंबों से एक खाका बनाएँ तो उनकी नज़्में पहाड़ों और वादियों में आने का न्यौता देती हैं, काले-काले मेघों से अपने सूखे गाँव का हाल बतलाती हैं, चहकती चिड़िया की मस्ती निहारती हैं, बेरंग गर्मियों का जायजा लेती हैं, पहाड़ों पर आधी आँखें खोलकर सोती हैं, बुजुर्ग लगते चेन्नई, जादुई लगती मुंबई, धूपिया लगती दिल्ली और सदाबहार लगते कोलकाता की यादें संजोती हैं, कागज के पैराहन पर लिखी तहरीरें बाँचती हैं और टूटते हुए मिसरों की हिचकियाँ सुनती हैं, किसी अजीज के साथ पूरा दिन गुजारने की तमन्ना रखती हैं और उसके बगैर सोने के लिए नींद की गोलियाँ तलाशती हैं, पेड़ों की पोशाकों से बदलते मौसम का मिजाज पहचानती हैं और जानती हैं -कोई मौसम हमेशा के लिए नहीं रहता।
कहना न होगा कि सुख दुख के ऐसे लम्हे काग़ज पर उतरते हैं तो नज़्मों का रंग पोरों पर रह जाता है। कुछ शख़्सियतों की यादें गुड़ की भेली की तरह जीवन में मिठास भरती हैं और गुलज़ार की नज़्में भी यही करती हैं। क्लासिकी और संयम के साथ रची इन नज़्मों को गुलज़ार के लफ़्ज़ों में ही कहना हो तो यही कहना होगा- 'कल का हर वाकया तुम्हारा था/ आज की दास्ताँ हमारी है।
मौलश्री की छाया है उनकी ग़ज़ल
हवा गुज़र गयी, पत्ते थे कुछ, हिले भी नहीं
वो मेरे शहर में आये भी और मिले भी नहीं
ग़ज़लों की दुनिया में भी उनके भीतर झाँकिए तो एक ऐसे शख़्स से मुलाकात होती है जो बोलचाल के लहजे में ग़ज़ल कहता है और दिल की बात करता है। वह भले ही फिल्मी दुनिया का बाशिंदा हो, पर उसके कहे में एक नफ़ासत है। वह नज़्मों का उस्ताद शायर है। वहां जीवन संसार के तमाम अछूते बिम्ब मिलते हैं और नई कविता की-सी ताजगी, जिससे गुजरते हुए कविता के नए स्थापत्य से गुज़रने का आभास होता है। उसके दर्द शब्दों के लिबास में लिपटे होते हैं। वह फिल्मों के लिए गीत लिखता है या ग़ज़ल तो उसमें कविता की छुवन होती है। वह फिल्मों में भी कविताई करता है जैसे अपनी पटकथाओं में दिल के जख़्म उधेड़ता है।
कुछ ही बरस पहले जब उनकी ग़ज़लों व त्रिपदियों की पुस्तक ‘ कुछ तो कहिए ‘ आई तो उसे छूने का पहला अहसास काफी देर तक सँजो के रखा। भले गुलज़ार पापुलर मीडियम के लेखक हों, उनके प्रशंसकों की तादाद असल और आभासी दोनों दुनिया में बेशुमार हो, उनके भीतर का कवि इन तारीफों से छिटक कर अपने एकांत में खुश नज़र आता है। वे इतने बहुपठित हैं कि शेरो शायरी की सदियों पुरानी रवायत उनकी कविताई में सांस लेती है। वे कवि न होते तो जिगर से बीड़ी जलाने की बात भला क्योंकर करते जिसे कोई नफ़ासतपसंद शख़्स भी तरजीह देता और राह चलते आम फहम आदमी भी इसे आसानी से समझ लेता है। गुलज़ार यह काम कुशलता से अंजाम देते हैं कि वे फिल्मों में भी लिख रहे हों तो एक हद और कवि-कद से नीचे नहीं उतरते।
गुलज़ार जज़्बात के शायर हैं। हर शख़्स के भीतर कहीं कुछ टूटा फूटा होता है, उसे एक बेहतर रफूगर चाहिए। शायद ऐसे ही हालात में हम जब उनकी किसी ग़ज़ल या कविता के पास जाते हैं तो हमें कुछ सुकून मिलता है। ग़ज़ल की छाया भी किसी मौलसिरी की छाया से कम नहीं । उसके नीचे लेटे और इसे सुनते पढ़ते सुहानी नींद आ जा जाए तो अचरज नहीं। गुलजार की ग़ज़लों की बात हो तो उदासियों, बीते रिश्तों, उदास शामों, खामोश जख़्मों, दिली सुकून, इंतज़ार, हिचकियों, ख़यालों, आरजूओं, भारी सांसों और तन्हाइयों की शायरी सामने आती है। यथार्थ की तल्ख ज़िन्दगी में भला कौन इससे मुक्त है। कौन है जिसके जीवन की पटकथा में कुछ ग़मज़दा अफसाने न हों, किसका सफ़र है जो आसानियों से कटता हो, कौन है जो तमाम रंजोग़म से फ़िक्रमंद न हो।
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी
गुलज़ार की नज़्मों के कई संग्रह आ चुके हैं। फिल्मों में लिखी शायरी और गीतों के चयन भी। पर वे उर्दू शायरी की जिस परंपरा से आए हैं, वहां दुनियावी सतहीपन से बचाए रखने की जद्दोजेहद भीतर चलती रहती है। उनकी नज़्में और ग़ज़लें इस जहनी अहसास से वाकिफ़ हैं।
एक बार का वाकया है, आई आई सी, दिल्ली में पाकिस्तान के महबूब शायर अहमद फ़राज़ की शान में एक गोष्ठी हुई। उन्हें सुनने दिल्ली और बाहर से तमाम शायरी के दीवाने इकट्ठा थे। दिल्ली की खूबसूरत आबादी का एक हिस्सा भी वहां मौजूद था। दूसरी तरफ़ गुलज़ार भी श्रोताओं में थे। फ़राज़ ने एक ग़ज़ल पढ़ी और गुलज़ार को यों याद किया ---
देख कर उनके रुख़्सार ओ लब यकीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी।
खूबसूरती के बरक्स यहां गुलज़ार को चिह्नित करना उनकी मकबूलियत को सेलीब्रेट करना है। यह दो बड़े शायरों का आमना सामना भी है कि वे एक दूसरे को किस तरह अपने मजमुए में शामिल करते हैं।
'कुछ तो कहिए' संग्रह में जिन ग़ज़लों , शेरों व त्रिपदियों पर निगाह गयी उनमें से कुछ पेशेखिदमत हैं—
अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ
वो जो बहते थे आबशार कहाँ
पूरिया का उदास उदास आलाप
सर्द शामों का वो गु़बार कहाँ
•
दिन से आँचल छुड़ा के डूब गयी
शाम आंखें सुजा के डूब गयी
जब मैं पहुंचा तो सुर्ख थीं आंखें
शाम पलकें झुका के डूब गयी
•
बीते रिश्ते तलाश करती है
खुशबू गुंचे तलाश करती है
जब गुज़रती है उस गली से सवा
ख़त के पुरजे तलाश करती है
बूढी पगडंडी शहर तक जाकर
अपने बेटे तलाश करती है
•
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते
जिसकी आवाज़ में सिलवट हो, निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते
•
किताबों से कभी गुज़रो तो यूँ किरदार मिलते हैं
गए वक्तों की ड्योढी में, खड़े कुछ यार मिलते हैं
जिसे हम दिल का वीराना समझकर छोड़ आये थे
वहां उजड़े हुए शहरों के कुछ आसार मिलते हैं
•
त्रिपदी ।।
दो ही लोगों की जगह नज़्म में है, आ जाओ
आओ ले चलते हैा अफ़लाक घुमा लायें तुम्हें !
याद रखोगे कि शायर से मुहब्बत की थी !!
गुलज़ार में आखिर क्या है जो हमें बांधता है। शायरी ने बहुत ऊँचाइयां छुई हैं, संवेदना, कथ्य और शिल्प के स्तर पर; फिर भी नज़्मों का अंदाज़-ए-बयां कुछ और होता है, शायरी की सुगठित कसावट की अपेक्षा जिसके तार कुछ ढीले होते हैं। गुलज़ार शब्दों से खेलने वाले और खेल-खेल में कुछ नया रचने वाले शख़्स हैं। इसलिए तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद वे हमें छूते हैं। उनकी इमेजरी गिलहरी की तरह संवेदना की टहनियों पर चहलकदमी करती है । ' पाजी नज़्में' पढ़ कर ऐसा ही कुछ अहसास हुआ। इसकी दो नज़्में पेशेखिदमत हैं,जिन पर अभी कुछ देर पहले निगाह देर तक अँटकी रही :
तुमसे जब बात नहीं होती ।।
•
तुमसे जब बात नहीं होती किसी दिन जानम
ऐसे चुपचाप गुज़रता है यह सुनसान-सा दिन
एक सीधी सी बड़ी लंबी सड़क पे जैसे
साथ-साथ चलता हुआ, रूठा हुआ दोस्त कोई
मुँह फुलाए हुए, नाराज़ सा, ख़ामोश, उदास
और जब मिलता हूँ हँस पड़ता है यह रूठा हुआ दिन
गुदगुदा कर मुझे कहता है, ‘कहो, कैसे हो यार!’
आप से तुम से, तू पे यूँ आए ।।
•
आप से तुम से तू पे यूँ आए
जैसे दफ्तर से, घर पे, बिस्तर में
कोट नेकटाई खोल कर मोज़े
ऐसे लेटे पसार के पांव
जैसे किसी भी दफ़्तर में
लौट कर अब नहीं जाना !
गुलज़ार की ग़ज़लों और नज़्मों की महीन बीनाई दिल के गुमशुदा तारों को खोज निकालती है। कहते हैं, शायरों ने फिल्मों में जाकर शायरी के मेयार को हल्का किया है, पर गुलज़ार के साथ ऐसा नहीं है। वे शायरी में अपनी पहचान और प्रयोगधर्मिता को अक्षुण्ण रखते हैं तथा हर बार तमाम ऐसे बिम्बों, प्रतीकों और कथ्य के जुदा अंदाज़-ए-बयां से अपने चाहने वालों को हतप्रभ कर देते हैं। हर बार उनकी शायरी से एक नई धुन, एक नई छवि प्रकट होती है। पाजी नज़्में उनकी इसी बेतकल्लुफी का पर्याय हैं, जहां वे अपने विट को शायरी की खराद पर चमकाते हैं और कई बार अप्रत्याशित-सा अर्थ देने वाले वाक्यों-पदों से भी वे मानीखेज़ मंतव्य निकाल लेते हैं। उनकी शायरी भी जैसे खुदा से की जाने वाली इबादत या हँसी-ठठ्ठा हो। जब वे कहते हैं --
जब धुआं देता, लगाता पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आये कि सब देख रहे हो। (चिपचे दूध से नहलाते हैं)
दुनिया जिस अदृश्य ताकत के नाम पर सारा कारोबार चलाती है, मजहब जिस तरह अपने अपने खुदाओं को लेकर संवेदनशील रहता है, उसकी जबानें पता नहीं, खुदा या ईश्वर समझता भी है या नहीं। दुनिया जिस खतरनाक मोड़ पर खड़ी है जहां हिंसा, मानवीय त्रासदियां और मजहब की दुकानदारियां सरसब्ज हैं, वहां ईश्वर या खुदा नाम की कोई चीज है भी और वह आदमी की जुबान को समझता है, ऐसा नहीं लगता । गुलज़ार ऐसे उदासीन खुदा से शिकायत करते हैं कि मैं तो जितनी ज़बानें बोल सकता हूँ सब मेरी आजमाई हैं, पर तुमने शायद एक भी जबान नहीं समझी अभी तक। न तुम गर्दन हिलाते हो न हंकारा ही देते हो। कितनी बेचारगी से वे लिखते हैं -
पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना....
न होती गुफ्तगू, तो कम से कम,
चिट्ठी का आना-जाना तो रहता। (मैं जितनी भी जबानें बोल सकता हूँ)
हमारे बीच आवाज़ों का दरिया बहता ही रहता है । पर आवाज़ें कभी कभी इतनी भारी होती हैं कि सिर के ऊपर से गुजर जाती हैं और अल्फ़ाज़ इतने पटाखेदार कि अगले दिन जैसे जली हुई फुलझड़ियों की राख बुहारनी पड़ती है। गुलज़ार इस फील को एक नज्म़ में बयान करते हैं। देखें तो यह एक शायर की अपनी कसौटी भी है कि वह चुनिंदा शब्दों, बिम्बों, प्रयोगों से एक ग़ज़ल, एक नज़्म गढ़ता है। उसे लुप्प से जल कर पटाखों या फुलझड़ियों-की मानिंद बुझ जाने वाले शब्दों से कोफ्त होती है, वे उसे दूर से ही पहचान में आ जाते हैं। दुनिया आज ऐसे ही भारी और बेमानी अल्फ़ाज़ से घिरी है।
एक अच्छी चाय का जलवा अलग ही होता है। चाय जिसके आस्वाद ने दुनिया भर को गुलाम बना रखा है, उस पर शायर जब नज़्म लिखता है तो उसका अंदाज़-ए-बयां भी कुछ अलग होता है। एक अच्छी चाय क्या होती है इसे गुलज़ार अपने तरीके से समझाते हैं। वे कहते हैं, होठों से जब चूम के देखोगे, तब जानोगे/ अच्छी चाय क्या होती है। एक शायर चाय को किस नज़रिये से देखता है उसे गुलज़ार के लफ़्ज़ों में यों कहेंगे --
तीन-तीन सिंगार हैं इसके...
दूध का छुवां, चुटकी भर सिंदूर के जैसा
या एक 'त्राशा' निम्बू का, मुस्कान के जितना
वरना कोरी कुंवारी चाय चूम के देखो
महकी-महकी सांसों से जब नाक छुएगी
पता चलेगा....अच्छी चाय क्या होती है ! (चाय)
पर हम तो कहेंगे कि एक अच्छी नज़्म क्या होती है, इसे गुलज़ार की नज़्मों से गुजरते हुए ही महसूस किया जा सकता है।
पहले पहल पाजी नज़्में की चर्चा सुनी, उसकी खुशबू मुझ तक पहुंची तो लगा गुलज़ार के भीतर भी जैसे कोई पाजी शख़्स रहता है। ये पाजी नज़्में क्या हैं भला। जरूर शायद कुछ ललित दुष्टताएं इनमें घुली होंगी जैसे ‘काशी का अस्सी’ में घुली हुई गालियां। पर इन नज़्मों के पहले गुलज़ार जैसे एक माफीनामा पेश करते हैं कि ‘’ये करो और कान पकड़ लो’’ वाली नज़्में हैं। इन्हें पढ़ कर, सुन कर जैसे ‘धत् पाजी’ की आवाज़ आती है। पर वे कहते हैं कि ‘’मजा लो , तो इतनी पाजी भी नहीं हैं।‘’ कहना न होगा कि एक शायर अपने अल्फ़ाज़ से एक नई दुनिया खड़ी करता है, अनुभवों की, हवालों की, कचोटों की, नए से नए अहसासों की । गुलज़ार यही करते हैं। एयरपोर्ट पर वक़्त ज़्यादा लग रहा है तो एक नज़्म वक़्त काटने को लेकर लिख जाती है। कितना मुश्किल है वक़्त काटना। कहते हैं सुख का वक्त पंख लगा कर उड़ जाता है पर दुख का एक एक पल सदियों जैसा दुर्वह लगता है। गुलज़ार की 'वक़्त' नज़्म जैसे एक बैठे ठाले की नसीहत हो। ऐसे ही कस्टम क्लियरेंस के वक्त जामातलाशी में बयाननामे पर दस्तखत करने के बाद भी जो चीज साथ चली आती है, वह कोई आरजू होती है जो किसी भी स्कैनिंग में पकड़ में नहीं आती। गुलज़ार इस फील को भी अपनी नज़्म 'डिक्लेरेशन' का हिस्सा बनाते हैं।
हमारे समाज में इधर कुछ सालों से जो मोबाइलपरस्ती आई है उसने कुछ अजीब से दृश्यों से हमे रूबरू किया है। कुछ ऐसा कि मोबाइल से निजात मुश्किल है। आज ऐसा कोई शख़्स मुश्किल से मिलता है जिसका हाथ कानों पर न हो और जो अपने आप में मोबाइल कान पर लगाए हंसता मुस्कराता नज़र न आता हो। कोई हाथ खाली नहीं दिखता। कुछ ऐसा रिश्ता इससे जुड़ गया है कि गुलज़ार तक को कहना पड़ता है--
इस दुनिया में खाली हाथ आता है इन्सां
जाता है, मोबाइल लेकर जाता है।
हालांकि किसी शायरी, कविता या किसी नज़्म के लिए यह जरूरी नहीं कि वह किसी समस्या का कोई मुकम्मल समाधान हो, या वह किसी संदेश या सलाहियत के साथ ख़त्म हो। पर गुलज़ार की ये नज़्में पाजी नज़्में होकर भी कुछ न कुछ मूल्यवान संदेश देती हैं। वे इन नज़्मों में खोती हुई तहजीब और कल्चर की बात करते हैं तो हवाई जहाज में हादसे के वक़्त कैसे ऑक्सीजन मास्क लगा कर सीट के नीचे जैकेट पहन कर कूदना है इस हिदायत के बावजूद कितना मुश्किल होता है मरना, इस डर की भी वे ख़बर लेते हैं। इन नज़्मों में वे कुछ मसखरी से भी पेश आते हैं जिससे कि वाकई 'धत् पाजी' की मीठी सी फटकार सुनने को मिले। नज़्मों को लेकर उनकी यह कल्पना भी कितनी नायाब है ---
नज़्में भी सब्जी मंडी में बिकतीं तो कुछ और ज्यादा बिकतीं!
ताजा ताजा एक भाव से
स्वादी, फींकी छाँटी जाएं
छोटी-बड़ी भी लोग अपनी फुर्सत के बट्टे रख के तोलते
''बस बस , इतनी ही काफी हैं....
इक छोटी वाली और चढ़ा दो ! ''
शैल्फ़ पे रख देते तो गर्द ही पड़ती रहती
फ्रीज में रखने से.....
वक़्त ज़रूरत काम आती हैं !
उनकी शायरी हो, नज़्में हों, अशआर हों या त्रिपदियां या फिल्मी नग्मे ही --- गुलज़ार की शायरी एक नए मिज़ाज का आग़ाज हैं जिनमें विट है, तंज है, गुस्सा है, ईश्वर की लाचारी पर हास परिहास भी है और लगता है ये फुर्सत में रची गयी शरारतें हैं जिनमें गुलज़ार का चेहरा नेपथ्य से हँसता मुस्कराता नज़र आता है। पर एक हक़ीक़त यह भी है कि गुलज़ार हर उस शख़्स के शायर हैं जो कहीं से टूटा है, किसी से बिछड़ा है, किसी के प्यार में पागल है, किसी ने धोखा दिया है, किसी न किसी के ख़याल में खोया-सा रहता है, किसी न किसी की राह देखा करता है, अपनी ज़िन्दगी के गमगीन सीन छुपाये फिरता है, गुज़िश्ता रिश्तों की बारिशों को याद कर विकल होता है। गुलज़ार की ग़ज़लें जलती आंखों पर ठंडे पानी के छींटे की तरह हैं।
गुलज़ार अरसे से हर विधा और मिजाज़ --फिल्म, ग़ज़लगोई, कविताई, अंदाज़-ए-बयां में उम्दा हैं। उनके भीतर के कवि के मिजाज़ को हू ब हू पकड़ पाना आसान नहीं। अरसे से उन्हें शब्दों में सहेजने के लिए यतीन्द्र मिश्र लगे हैं --उनके जीवन, शायरी और फिल्मी सफ़र को गुफ्तगू के जरिए एक सुगठित तरतीब देने के लिए। पाठकों के लिए गुलज़ार और यतींद्र की यह सौगात जब भी आएगी यह एक नए गुलज़ार का आगमन होगा, वह गुलज़ार जो अपने ही शब्दों में झुरमुट में कितना ढंका मुँदा है कि उसे सहज ही खोज पाना-समझ पाना मुश्किल होता है। उनका एक एक मिसरा, मतला, गाने की धुनें एक मीठी टीस की तरह कितने दिलों के तहखानों में आज भी तरोताजा हैं। यतीन्द्र ने गुलजार की सारी पंखुड़ियां खोल कर रखने में कामयाबी पाई होगी---बहुत सारी अनकही बातें जो एक शायर को गुलज़ार बनाती है। हिंदी में शमशेरियत की बात होती है, गुलज़ार की गुलज़ारियत का भी अपना रंग है जिस राह पर चलने वाले कम हैं । इस अर्थ में वे विरलता और अनूठेपन की मिसाल हैं। गुलज़ार को जन्मदिन की हार्दिक बधाई।
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4 वर्ष पहले
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