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गुलज़ार: कवि न होते तो जिगर से बीड़ी जलाने की बात भला क्यों करते...

गुलज़ार: कवि न होते तो जिगर से बीड़ी जलाने की बात भला क्यों करते...
                
                                                         
                            
डॉ.ओम निश्चल

शायरी और किस्सागोई से लेकर फिल्म निर्माण, पटकथा-संवाद लेखन व निर्देशन तक गुलज़ार का एक बड़ा कारोबार फैला है लेकिन यह कारोबार अभी फिल्म दुनिया की बाजारवादी माँग और आपूर्ति का संसाधन नहीं बना है। वह पूरी तौर पर अदबी और रचनात्मक है। गुलजार का होना यह बताता है कि उनकी शायरी की शुचिता फिल्म दुनिया की कारोबारी समझ के बावजूद कायम है।

उनके प्रशंसक बेशुमार हैं, उनके गीतों-नज़्मों को जहाँ लाखों करोड़ों लोगों की मुहब्बत हासिल है, कविता प्रेमियों को भी उसने अपने भाव-संसार और अंदाज़-ए-बयाँ से प्रभावित किया है। उन्होंने अपनी शख़्सियत से यह जताया है कि एक सच्चा कवि रोजी-रोटी से समझौता करता हुआ भी अदब के लिए अपने दिल में एक खास जज़्बा रखता है। गुलज़ार ने फिल्मी गीतों से लेकर शायरी और नज़्मों के समानांतर सफ़र में अपने कवित्व की अनूठी सौगात से लोगों को नवाज़ा है।

हाल के बरसों में  गुलज़ार की शायरी के कई नए कलेक्शन आए। पंद्रह पाँच पचहत्तर, कुछ तो कहिए और पाज़ी नज़्में ।  'पंद्रह पाँच पचहत्तर' आधुनिक उर्दू कविता में मील का पत्थर है। अपने सीधे-सहज गीतों में वे जितना मुखर होकर मानवीय अनुभूतियों को करीब से छूते हैं, अपनी नज़्मों में वे आधुनिक संवेदना की गहराइयों में उतरते हुए लफ़्ज़ों को नए मानी देते हैं। उन्हीं का कहना है- 'मैंने काल को तोड़ के लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया।' पंद्रह खंडों में पाँच-पाँच कविताओं का यह संग्रह कुल पचहत्तर कविताओं का एक ऐसा गुलदस्ता है जो पचहत्तर पार गुलज़ार के जीवन और अनुभवों के अनेक शेड्स उजागर करता है। गुलज़ार की चित्रकारी के भी नायाब नमूने यहाँ पन्ने दर पन्ने पिरोए गए हैं जिन्हें निहार कर आँखों को एक रचनात्मक तृप्ति मिलती है। मुझे आईआईसी दिल्ली के एक जलसे की याद है जब पाकिस्तान के एक शायर ने अपनी ग़ज़ल के एक मिसरे में उन्हें पिरोते हुए कहा था-
 
देखकर उनके रुख़्सार-ओ-लब यकीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी।

'यार जुलाहे' (गुलज़ार) की भूमिका में यतींद्र मिश्र ने लिखा है - 'इच्छाएँ, सुख, यथार्थ, नींदें, सपने, जिज्ञासा, प्रेम, स्मृतियाँ और रिश्तों की गुनगुनाहट को उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में इतने करीने से बुना गया है कि हमेशा यह महसूस होता है कि वह किसी नेक जुलाहे के अंतर्मन के तागे से बुनी गई हैं। इसमें संदेह नहीं कि गुलज़ार की नज़्मों-कविताओं में कविता और शायरी की सदियों पुरानी परंपरा सांस लेती है और वे हर बार अपनी अनुभूतियों को भाषा और संवेदना का नया जामा पहनाते हैं।'

इन नज़्मों में पिरोए गए बिंबों से एक खाका बनाएँ तो उनकी नज़्में पहाड़ों और वादियों में आने का न्यौता देती हैं, काले-काले मेघों से अपने सूखे गाँव का हाल बतलाती हैं, चहकती चिड़िया की मस्ती निहारती हैं, बेरंग गर्मियों का जायजा लेती हैं, पहाड़ों पर आधी आँखें खोलकर सोती हैं, बुजुर्ग लगते चेन्नई, जादुई लगती मुंबई, धूपिया लगती दिल्ली और सदाबहार लगते कोलकाता की यादें संजोती हैं, कागज के पैराहन पर लिखी तहरीरें बाँचती हैं और टूटते हुए मिसरों की हिचकियाँ सुनती हैं, किसी अजीज के साथ पूरा दिन गुजारने की तमन्ना रखती हैं और उसके बगैर सोने के लिए नींद की गोलियाँ तलाशती हैं, पेड़ों की पोशाकों से बदलते मौसम का मिजाज पहचानती हैं और जानती हैं -कोई मौसम हमेशा के लिए नहीं रहता।

कहना न होगा कि सुख दुख के ऐसे लम्हे काग़ज पर उतरते हैं तो नज़्मों का रंग पोरों पर रह जाता है। कुछ शख़्सियतों की यादें गुड़ की भेली की तरह जीवन में मिठास भरती हैं और गुलज़ार की नज़्में भी यही करती हैं। क्लासिकी और संयम के साथ रची इन नज़्मों को गुलज़ार के लफ़्ज़ों में ही कहना हो तो यही कहना होगा- 'कल का हर वाकया तुम्हारा था/ आज की दास्ताँ हमारी है।
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4 वर्ष पहले

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