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रामदरश मिश्र: हिंदी विश्व के एक सतत सहयात्री

रामदरश मिश्र: हिंदी विश्व के एक सतत सहयात्री
                
                                                         
                            कविता, कथा, उपन्यास, संस्मरण, आत्मकथा, ललित निबंध, आलोचना इत्यादि विधाओं में जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं,उस लेखक का नाम रामदरश मिश्र है। संप्रति लेखकों में सबसे वरिष्ठ रामदरश जी की जीवन यात्रा डुमरी गांव गोरखपुर से शुरु हुई तथा खेतों खलिहानों से होती हुई कुदरत के सौंदर्य बोध ने कवि को प्रकृति का अनुगायक बना दिया। पहली बार कविता उसके मन में गीतों के रूप में फूटी। छंद में सिद्धि धीरे धीरे मिलती गयी। इस कविता यात्रा की शुरुआत 'पथ के गीत' संग्रह से हुई । एक तरफ रामदरश जी 'पथ के गीत' लिख रहे थे वहीं त्रिलोचन 'धरती'  के गीत । इस तरह गांव जवार के अनुभवों के ताने बाने से समृद्ध होते हुए रामदरश जी प़ढ़ने के लिए बनारस आए जहां एक तरफ गीतों की आबोहवा थी दूसरी तरफ नई कविता की बयार बह रही थी। त्रिलोचन जी सात साल बड़े तो  केदारनाथ सिंह जी दस वर्ष छोटे। नई कविता के सहयात्री। नामवर जी के उद्भव और विकास का वह प्रारंभिक चरण था। बनारस में उस समय गुरुवर हजारीप्रसाद द्विवेदी, शिवप्रसाद सिंह, शंभुनाथ सिंह, ठाकुरप्रसाद सिंह जैसे साहित्यिकों का सानिध्य मिला। नए कवियों के प्रभाव में रामदरश जी ने भी धीरे धीरे नई कविता की राह अपनाई और बैरंग बेनाम चिट्ठियां से उन्होंने नई कविता में दमदार ढंग से प्रवेश किया तो यह यात्रा आज तक चल रही है। इस बीच उन्होने अनेक विधाओं में पदार्पण किया।
                                                                 
                            

 आंचलिकता की जो पृष्ठभूमि रेणु ने मैला आंचल से तैयार की थी उस राह पर बढ़ते हुए रामदरश जी ने पानी के प्राचीर, जल टूटता हुआ, सूखता हुआ तालाब, आकाश की छत और अपने लोग जैसे उपन्यास दिए। उपन्यास यात्रा का दूसरा पड़ाव दूसरा घर था। बीच में अनेक उपन्यास आए बिना दरवाजे का मकान, थकी हुई सुबह, बीस बरस,परिवार, बचपन भास्कर का, एक बचपन यह भी तथा एक था कलाकार आदि। कथायात्रा में जहां डेढ़ दर्जन से ज्यादा उपन्यास लिखे वहीं दो सौ से ज्यादा कहानियां जो खालीघर, एक वह दिनचर्या सर्पदंश, बसंत का एक दिन से लेकर इस बार होली में तक संग्रहों में शामिल हैं। वे पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के शिष्य रहे तो ललित निबंधों की ओर भी मुड़ना स्वाभाविक था। लिहाजा,  कितने बजे हैं, बबूल और कैक्टस, घर परिवेश, छोटे छोटे सुख व नया चौराहा जैसी कृतियां आईं तो आत्मकथा सहचर है समय बहुत चर्चित हई। दो यात्रा वृत्त, पांच डायरी संग्रह, आलोचना की ग्यारह पुस्तकें, चार संस्मरणात्मक कृतियों, कई संचयनों के लेखक रामदरश जी विभिन्न विधाओं में आवाजाही करते हुए भी मूलत: कवि हैं। कविता में भी गीत, नई कविता के साथ उन्होंने ग़ज़ल में भी लंबी साधना की है तथा उनके छह ग़ज़ल संग्रह आ चुके हैं।

 बनारस से संयोगों ने उन्हें गुजरात भेजा पर वहां पहुंच कर वे अकेले नहीं पड़े बल्कि सात आठ साल के भीतर उन्होंने एक बड़ी आत्मीय दुनिया बनाई। गुजरात के ही उनके एक शिष्य श्री रघुवीर चौधरी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार तक मिल चुका है। वहां उनके अलावा भोलाभाई पटेल व महावीर सिंह चौहान जैसे  चाहने वाले शिष्य मिले तथा ऐसे  बेशुमार प्रेमी जो देश के कोने कोने में हैं। 1964 में गुजरात से दिल्ली वापसी के उस दौर में दिल्ली में डॉ नगेंद्र का सहयोग और मार्गदर्शन मिला । दिल्ली विश्वविद्यालय में उनके शिष्यों की भरमार थी। उसमें रामदरश मिश्र के आ जाने  से दिल्ली की साहित्यिक धड़कन को और जीवंतता मिली।  पहले वे पीजी डीएवी काॅलेज से जुड़े फिर 69 में विश्वविद्यालय में आ गए। दिल्ली से ही उनकी रचनात्मकता का तीसरा चरण शुरू हुआ तथा यहां रह कर उन्होंने प्रभूत साहित्य लिखा। उन दिनों दिल्ली साहित्य का गढ़ था और आज भी है। आज 97 साल की वय पूरा कर वे 98वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, यह ईश्वर और प्रकृति  की कृपा है।

लेखन में पत्नी के सहयोग को विस्मृत नहीं किया जा सकता। श्रीमती सरस्वती मिश्र जी ने सहधर्मिणी के रूप में रामदरश जी को जीवन के संघर्षों, धूप ताप से काफी हद तक बचाये रखा। दुकान दौरी सब सम्हालते हुए उनकी रचनायात्रा को निहारती रहीं,  पढ़ती और मन ही मन उन्हें सराहती रहीं। अपनी पढ़ाई भी पूरी करती रहीं। इस बीच गृहस्थी का ताना बाना भी चलता रहा। तीन पुत्र दो पुत्रियों और बहू नाती और पोते पोतियों के बीच पति पत्नी दोनों एक सदगृहस्थ की तरह रह रहे हैं। रामदरश जी ने अपने को  किसी अप्रिय वाद विवाद का विषय नहीं बनने दिया। उनके खाते में भले ही पुरस्कार देर से आए हों पर देश विदेश में पाठकों की सर्वस्वीकृति मिली। यही कारण है कि इस बारे में पूछने पर उन्होंने कभी एक ग़ज़ल ही रच दी:

''जहां आप पहुंचे छलाँगे लगाकर
वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे धीरे।''  


 पर पुरस्कारों की बात करें तो उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत भारती पुरस्कार, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान, दयावती मोदी साहित्य सम्मान जैसे सभी बड़े पुरस्कार मिले और हिंदी संस्थान सहित तमाम संस्थाओं से वे कई बार पुरस्कृत सम्मानित हुए हैं। इसके अलावा हिंदी साहित्य सम्मेलन सहित अनेक मान्य संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया।

 यह भी कम उपलब्धि नहीं कि उनके रचना संसार के विभिन्न पहलुओं/ विषयों पर अब तक कोई ढाई सौ से ज्यादा शोध कार्य संपन्न हुए हैं। कितने शिष्य उनके देश विदेश में फैले हैं। रामदरश जी का जीवन एक संदेश की तरह है। वे लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत की तरह है। उन्हें देख कर बशीर बद्र की ये पंक्तियां याद हो आती है कि

यों तो हम देने के काबिल ही कहां है लेकिन
हां कोई चाहे तो जीन की अदा ले जाए ।
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2 वर्ष पहले

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