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ओमा द अक्: सभ्यता की सलामती की दुआएं मांगता एक संत कवि

साहित्य
                
                                                         
                            कवि वह है जो विराट के समक्ष
                                                                 
                            
क्षुद्र को हाशिये पर जाने से बचाए!
वह कैसा कवि है जो समय के दंश अपराध शोषण भूख लाचारी ग़रीबी
के विरुद्ध स्वर नहीं दे सकता!
अपितु बैठा पाँव पर पाँव चढ़ाए केवल.
वसन्त कलिका वेणी शहद चुम्बन यौवन आलिंगन स्वेद
के कामपीड़ित पद्य.वमन करता है!
अथवा.
रोता है अपना रोना अपना दुःख अपनी नींद अपनी भूख अपना खोना। 
                (मँहगी कविता। ओमा द अक्)


यह कविता ओमा द अक्  की है जिनका कविता संग्रह 'मँहगी कविता' हाल ही में प्रकाशित होकर हिंदी समाज के सम्मुख आया है। कविता को मँहगे मूल्य से जोड़ने के पीछे ओमा द अक् का कहना है कि लोग मँहगे से मँहगे ब्रांड की वस्तुएं खरीद सकते हैं, किन्तु वे पुस्तक के लिए सस्ता मूल्य चाहते हैं गो कि वे सस्ते मूल्य की पुस्तकें भी न खरीदते हैं न पढ़ते हैं क्योंकि मध्यवर्ग जिसकी क्रय क्षमता है वह कविता से विमुख है ,बेशक, मँहगी अंग्रेजी की पुस्तकें उसके ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाने के लिए करीने से लगी मिल सकती हैं। ऐसे में ओमा द अक् की पचीस हजार रूपये मूल्य की यह पुस्तक पहली नज़र में अचरज जगा सकती है पर आप उनसे बात कीजिए तो अंतत: उनकी इस बात से सहमत होना पड़ता है कि उनकी कविताओं में आम आदमी,गरीब आदमी, किसान मजदूर की बात की गयी है जिसे पढ़ने की जरूरत वाकई मध्य या उच्च वर्ग के उन लोगों को है जो समाज के हाशिए पर पड़े इस जीवन से बहुत अनभिज्ञ हैं। 

ऐसे  स्वायत्त प्रतिभा और स्व-अनुशासित कवि से पहली बार विश्व पुस्तक मेला प्रगति मैदान के लेखक मंच पर मिला तो लगा कि यह कैसा कवि है जो देखने में तो सुकोमल है, किन्तु उसकी कविताएं एक अलग कवि-व्यक्तित्व का आभास देती हैं जो किसी भी वैचारिक रेजीमेंटेशन के विरुद्ध है और अपने जीवन विवेक और कवि विवेक से परिचालित होता है। तभी वह सरयू सतर्क जैसी कविता लिख सकता है। 

सरयू सतर्क !
तेरे तट पर बन्दरों के स्थान पर
बन्दरगाह आ रहा है!

(मँहगी कविता, पृष्ठ 198 )


ओमा द अक्  की यह कविता पढ़ते हुए पाया कि ऐसी एक भी कविता हिंदी की समकालीन कविता के खजाने में नहीं जो अयोध्या और सरयू को केंद्र बना कर इस तेवर में लिखी गयी हो। अयोध्या को 92 के दौर में भी देखा है जब कुंवर नारायण की कविता 'अयोध्या 92'   बहुत सुकोमल मनुहार के साथ राम से कह रही थी : सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ/ किसी पुराण----किसी धर्मग्रंथ में /सकुशल सपत्नीक / अबके जंगल वो जंगल नहीं/ जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक! ''

 

अगर तू बोल सकता है तो तुझे बोलने की छूट इसी शर्त पर देंगे कि....

ओमा द अक्क के इस कविता संग्रह 'मंहगी कविता' का चयन हिंदी की विदुषी कवयित्री अनामिका ने किया है और उन्हें इनमें तीन लयों की समाहिति दिखाई देती है -- जुती जमीन पर बीज छिड़कने, बारिश की लय तथा नववधू पर अक्षतदूर्वा  बरसाने की लय। वे कहती हैं, ''जब सिद्ध मौन की उर्वर माटी पर ओमा जी अपने शब्द छिड़कते हैं अलग-अलग स्रोतों से आये हुए शब्द -- तो ये तीनों लयें घुमरीपरैया-सी खेलती जान पड़ती हैं। 

'प्रतिरोध' शब्द अब घिस पिट गया है। सारी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और लालसाएं सत्ता के दुंदुभिगान में विलीन हो चुकी हैं। अभिव्यक्ति के सारे स्रोत संसाधन माध्यम पूंजी और सत्ता के सौंदर्यबोध को बखानने में व्यस्त हैं। पत्रकारिता का वह मिशन कहीं ज़मींदोज़ हो चुका है जिसका कौल कभी गणेश शंकर विद्यार्थी, गर्दे, पराड़कर जैसे पत्रकारों ने उठाया था। जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो के उद्घोष को प्रलोभन की वल्गाएं निगल गयीं। कविता में शिल्प के घूँघट में प्रतिरोध की चौपाई पढ़ी जा रही है। यह कलियुग का सुंदर कांड है। सब कुछ सत्यं शिवं सुंदरम् के आभा लोक में विरचित दिखता है। तथापि, कवियों को नई कहन की चिंता है, अंदाजेबयां की चिंता है, उस विद्रूपता की चिंता नहीं है जो यह कह सके : ' सरयू सतर्क, सभ्यता अयोध्या में प्रवेश कर चुकी है। '  

ओमा द अक् की कविता कहती है कि ' अगर तू बोल सकता है तो तुझे बोलने की छूट इसी शर्त पर देंगे कि तेरे बोलने में चाटने के हुनर के लहजे मिले हों।' (अरे, तू बोलता है) या फिर गांधी पर कविता लिखते हुए कौन इस नतीजे़ पर पहुंचा है कि 'गांधी तुम एक कंबल हो जिसे लपेट कर तमाम हत्यारे पवित्र हो जाते हैं और तमाम कमीने महान' । या कौन इस निष्कर्ष को निचोड़ कर  कहेगा  कि जब शहर हमारी तरफ आते हैं तो घास के तिनके तक घबराते हैं।

या फिर बसंत से कौन यह पूछेगा कि बसंत तुम सब जगह क्यों नहीं आते। ( बसंती भागीदारी) या जिन्दा लाशों को कौन ललकारेगा कि उठो लाशो! तुम्हारे जागने के दिन आए उठो निकलो।(जिन्दा लाशें) .....और प्रतिरोध की यह भाषा भंगिमा कविता में उभरते नकली प्रतिरोधी तेवर के नाते नहीं है, यह कवि की उस निर्मल मानसिक उद्वेलन से जन्मा है जिसकी कोख में ही सच्ची कविता के बीज छिपे होते हैं। तभी कोई कबीर जैसा कवि कह पाता है : निर्भय निरगुन गाऊँगा रे । या कि मैं केहुँ समझावहुँ ये सब जग अंधा। जैसा लीलाधर जगूड़ी आज की विज्ञापनबोधी संस्कृति को लक्ष्य कर कहते हैं, खबर का मुँह विज्ञापन से ढंका है, वैसा ही हम कह सकते हैं आज प्रतिरोध का मुंह कविता के शिल्प  से ढका है। 
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अगर तू बोल सकता है तो तुझे बोलने की छूट इसी शर्त पर देंगे कि....

एक वर्ष पहले

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