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पीड़ा और उल्लास की जुगलबंदी का दूसरा नाम है रचना तिवारी

साहित्य
                
                                                         
                            कुछ अरसे पहले मैं एक गीत संचयन के सिलसिले में गीतों की तलाश में था। फेसबुक खंगालते हुए एक कवयित्री के काव्यपाठ पर कान अँटक गए। कोई मधुर गीत होठों से उच्चरित होकर एक मंत्र सा प्रभाव छोड़ रहा था। बाद में अरसे तक इस कवि से कोई संपर्क न हो सका। लेकिन बाद सालाना साहित्य सर्वेक्षण करते हुए 2016 में उनका संग्रह सपना खरीदोगे बाबू जी पढ़ते हुए लगा यही तो वह कवयित्री है जिसने गीत और छंद को जीवन के एक मिशन के रूप में लिया है।  अच्छे गीतों का चयन पांच जोड़ बांसुरी पढ़ चुकने के बाद मुझे आज भी लगता है कि वैसा सम्यक् गीत चयन आज तक नहीं आया है जिसमें छंद का सौष्ठव हो, आधुनिकता की संवेदना हो और जीवन के सुख दुख राग विराग जद्दोजेहद सबकी सम्यक् अभिव्यक्ति हो।  हां कुछ गीतों के बुनकर अपनी सांसों के करघे पर अपने-अपने रचनात्मक एकांत में कुछ गुनते बुनते रहते हैं, उन्हीं में एक नाम रचना तिवारी का भी है। 
                                                                 
                            

एक दौर में मंच पर अपने मुक्तकों, अपनी ग़ज़लों और गीतों से कविता के आंगन को गुलज़ार करने वाली रचना तिवारी की लोकप्रियता का आलम यह है कि वे आज पूर्वांचल की साहित्यिक महफ़िलों की एक आइकन बन चुकी हैं। कविता के सौंदर्यशास्त्र पर पीएचडी करने वाली रचना तिवारी सोनभद्र में पैदा हुईं तथा साहित्यिक अभिरुचियों के पिता के सान्निध्य में पली बढ़ीं । चुर्क सीमेंट फैक्ट्री में उनके पिता अधिकारी रहे हैं । लिहाजा इंटर करते हुए ही इसी फैक्ट्री की पत्रिका 'सीमेंट समाचार' में पहली बार जब उनकी रचना छपी तो सबने उनके पिता से रचना की रचनाशीलता की तारीफ की । तब यह पता न था कि यह सराहना आगे चल कर यश:कीर्ति का गलहार बन कर रचना की छवि को दिग्दिगंत तक फैला देगी। 

10 मार्च 1970 में जन्मी रचना तिवारी की ख्याति पूर्वांचल के इस पिछड़े इलाके के सीवान में घुट घुट कर दम तोड़ देती यदि उन्होंने अपनी लेखनी का लोहा मंचों पर न मनवाया होता। अपने गीत लेकर वे कितने ही मंचों पर कविता पाठ कर चुकी हैं तथा नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज, रूप नारायण त्रिपाठी और उस वक्त के अनेक वरेण्य कवियों की प्रशंसा पा चुकी हैं। यहां तक कि अपने अध्ययन के दौरान चेन्नई रह कर धुर हिंदी विरोधी इलाके में अपने गीतों का परचम फहरा कर वहां के लोगों का दिल जीता और हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में भी अपनी भूमिका निभाई।  

कवियों की असली कमाई वह है जो उसे समय समय पर अपने इलाके में सम्मानित समादृत होकर मिलती है। सोनभद्र के राबर्ट्सगंज में अक्सर होने वाली साहित्यिक सामाजिक समारोहों में जिस एक शख्सियत को बार बार देखा सुना जा सकता है वे रचना तिवारी ही हैं।  आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

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