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रामदरश मिश्र : हिंदी की दुनिया का सबसे बड़ा नागरिक

साहित्य
                
                                                         
                            साहित्यकारों की बड़ी दुनिया है लेकिन इस बड़ी दुनिया के बावजूद साहित्यकार अकेला होता है । उसके साथ भीड़ नहीं चलती।  भीड़ तो नेताओं के साथ चलती है व्यापारियों के साथ चलती है।  रामदरश मिश्र न तो नेता थे ना व्यापारी थे।  वे साहित्य के साधक थे , सरस्वती के उपासक थे।  वे जब थे तो भी उनकी बैठक में साहित्यकारों की महफिल आनन फानन में जम जाती थी। अभी हाल तक जब बीमार होकर मजबूरन चारपाई पर पड़े थे लेकिन स्मृति और मेधा के धनी थे तो जैसे ही दो-तीन लेखक मिलने आते वे गोष्ठी सी जमा लेते थे।  
                                                                 
                            

सुनना सुनाना शुरू कर देते थे।  ऐसा व्यक्ति जो लगभग सब का प्रिय हो जो सबका प्रशंसक हो सबके कांधे पर हाथ धरता हो , सबको आगे बढ़ाता हो,निर्व्याज स्नेह करता हो ऐसे राम दरश जी ने जब आज महा प्रयाण किया तो उनके दाह संस्कार में साहित्यकारों प्रेमियों नाते रिश्तेदारों  की अपार भीड़ जुटती गई।  देश विदेश में जैसे  खबर फैली, अखबारों, वेब चैनलों और सोशल मीडिया पर उनके प्रति श्रद्धांजलि का ज्वार उमड़ पड़ा।  सबकी आंखों में एक नमी थी जिसे देखकर एक कवि की कविता याद आ रही थी : विदा समय क्यों भरे नयन हैं! आगे पढ़ें

श्मशान गृह में सैकड़ों की भीड़

9 महीने पहले

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