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साहिर लुधियानवी: शायर थे सो शेर कहकर बातें करते थे, लोग उसी कहे से तरह-तरह के अंदाज़े लगाते थे

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ऐसा कौन सा एहसास है जो साहिर लुधियानवी ने अपने शेर में बयां नहीं किया। आप कोई बा
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ऐसा कौन सा एहसास है जो साहिर लुधियानवी ने अपने शेर में बयां नहीं किया। आप कोई बात शेर में कहना चाहें तो साहिर की संदूक में वे सारे ख़जाने मिलेंगे। लेकिन वो एक दिन और चंद घटना में बने शायर नहीं हैं, बल्कि ज़िंदगी के तमाम ग़म और तपिश से निकले शायर हैं। वो शायर जिनका बचपन एक क्रूर पिता के साथ बीता, जिन्होंने माता-पिता के अलगाव को सहा, प्रेम करने से डरते रहे, शायद इसलिए जब किताब लिखी तो नाम रखा तल्खियां। तमाम हादसों से निकली और कड़वे एहसास से गुज़री ज़िंदगी के तमाम लफ़्ज़ इसमें समेटे उन्होंने। 

साहिर के देखकर कल्पनाएं करना, वैसा लिखने की इच्छा रखना, उनके इश्क़िया क़िस्सों को जीना - ये नए शायरों के जुनून है। लेकिन ये सिर्फ़ लिखने भर की बात नहीं है। साहिर ने कभी अपने अफ़ेयर के चर्चे नहीं किए, कभी कोई ख़त लोगों के सामने नहीं रखा, कभी किसी की मोहब्बत का जवाब नहीं दिया। साहिर धैर्यवान थे। शायर थे सो शेर कहकर बातें करते थे, लोग उसी कहे से तरह-तरह के अंदाज़े लगाते थे। साहिर के जीवन में उनकी मां की अहम भूमिका थी। वे बाहर बैठे दोस्तों से बात करते, कोई ज़रूरी बात निकलती तो तुरंत भागकर मां के पास जाते और उन्हें बताते। उन्होंने अपनी मां के संघर्ष को देखा था। शायद उसी वैवाहिक जीवन के संघर्ष का साक्षी होना था कि साहिर ने कभी शादी नहीं की। 

दोस्तों की महफ़िलें जमाना उन्हें ज़रूर पसंद था। तमाम बड़े शायर, निर्देशक, प्रोड्यूसर उसमें शामिल थे। मजाज़ से लेकर जां निसार अख़्तर तक। लेकिन वे दुनियावी नहीं थे, कलाकार वैसे भी दुनिया से विद्रोह में रहता है। ज़ाहिर है साहिर को भी कहां वे रस्में समझ आतीं। उनेक कुछ दोस्त उनके कपड़ों को चुनने व पहनने का मज़ाक बनाते, बाद में तरस खाते कि वाक़ई ये आदमी नहीं जानता कि पार्टी में कैसे कपड़े पहनने हैं। लेकिन जो जानता वो मानता कि उनका मयार कितना ऊंचा है। यश चोपड़ा ने अपने बंगले के परिसर में एक कमरा सिर्फ़ साहिर के लिए रखा था, जहां वह शांति से लिख सकें। 

6 फुट की देह का व्यक्ति समाज के कई दायरों में फिट नहीं होता था, वह इश्क़ के मामले में चुप रहता था जबकि अमृता प्रीतम ने इकतरफ़ा क़िस्से कह-कहकर किताब लिख दी। साहिर के जो क़िस्से हैं, वे उनके दोस्त ही सुनाते हैं या फिर कुछ किताबें लेकिन वे भी इश़्क में किसी का नाम नहीं लेतीं। इसकी इतनी ज़रूरत भी क्या है? कलाकार की तवज्जो ही उसकी कला है, फ़न है। फिर जैसा कि शुरुआत में लिखा कि ऐसा कौन सा एहसास है जो साहिर लुधियानवी ने अपने शेर में बयां नहीं किया। 

एक वर्ष पहले

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