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ममता जी सच कहती हैं कि इलाहाबाद सिर्फ रहने की नहीं, बल्कि "जीने की जगह है

साहित्य
                
                                                         
                            आज जब हमारी उंगलियां दिन भर स्मार्टफोन की स्क्रीन पर बस 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' खिसकाने में लगी रहती हैं, तब साहित्य की दुनिया से एक ऐसी खबर आई है जो हमें पल भर रुककर अपने अतीत, अपनी यादों और अपनी जड़ों की ओर देखने पर मजबूर कर देती है। हम बात कर रहे हैं हिंदी साहित्य की उस धाकड़ और 'खांटी' लेखिका ममता कालिया की, जिन्हें 2025 के 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से नवाजा गया है। 
                                                                 
                            

16 मार्च 2026 की शाम को  साहित्य अकादमी ने 24 भारतीय भाषाओं के लिए अपने इन सर्वोच्च पुरस्कारों का ऐलान किया, तो हिंदी साहित्य के खेमे में खुशी की लहर दौड़ गई। वजह साफ थी–यह सम्मान किसी ऐसी-वैसी किताब को नहीं, बल्कि ममता कालिया की उस जादुई संस्मरण पुस्तक 'जीते जी इलाहाबाद' को मिला है, जिसने बीते कुछ वर्षों में पाठकों को इलाहाबाद की उन भूली-बिसरी गलियों का चस्का लगा दिया है, जो कभी हिंदी साहित्य का मक्का हुआ करती थीं। 

इस मौके पर अंग्रेजी के लिए पूर्व राजनयिक नवतेज सरना को उनके उपन्यास 'क्रिमसन स्प्रिंग' के लिए भी यह सम्मान मिला, लेकिन हिंदी पट्टी के लिए तो 'जीते जी इलाहाबाद' का जश्न ही सबसे बड़ा था। 

ममता जी सिर्फ अपनी लेखनी में ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी कितनी सहज और आम इंसान हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि पुरस्कार की घोषणा के तुरंत बाद उनका रिएक्शन क्या था। कोई भारी-भरकम साहित्यिक के बजाय उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर अपने पाठकों के लिए लिखा: "दोस्तो धन्यवाद, शुक्रिया। ऐसा बहुत कम होता है कि हमारे फोन पर ट्रैफिक जाम हो। माफी। आपका प्यार अब प्यार देने से ही पूर्ण होगा। आप सब की दुआएं मुझे अगली किताब लिखने के लिए उकसाती हैं।"  


85 वर्ष की आयु पार कर चुकी एक लेखिका का यह उत्साह, यह 'नेवर से डाई' वाला जज्बा ही उन्हें आज की युवा पीढ़ी से जोड़ता है। 

अब आप सोचेंगे कि आखिर इस 'जीते जी इलाहाबाद' में ऐसा क्या खास है जिसने साहित्य अकादमी  का दिल जीत लिया? अक्सर 'संस्मरण'  के नाम पर लोग अपनी ही तारीफों के पुल बांधते हैं या फिर बोरिंग सा इतिहास लिख डालते हैं। लेकिन ममता जी की यह किताब एक 'टाइम-मशीन' है!

एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद बताया था कि शुरुआत में इस किताब को लिखने का उनका कोई लंबा-चौड़ा इरादा नहीं था। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'तद्भव' ने उनसे इलाहाबाद की यादों पर एक छोटा सा लेख मांगा था। लेकिन जब ममता जी ने लिखना शुरू किया, तो पुरानी यादें उंगलियों पर ऐसी उतरी कि वह एक पूरी किताब बन गई। 

इस किताब में रानीमंडी का उनका वह पुराना मकान है, चौक का शोर-शराबा है, लोकनाथ की गलियों के चटखारेदार स्वाद हैं और सबसे बढ़कर, उस दौर के साहित्यकारों की वो 'बतकही' और 'फक्कड़पन' है जो अब शायद ही कहीं देखने को मिले। ममता जी कहती हैं कि इलाहाबाद सिर्फ रहने की नहीं, बल्कि "जीने की जगह है।" 

इस किताब का एक किस्सा तो इतना मशहूर है कि वह सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हुआ। बात उन दिनों की है जब हिंदुस्तानी अकादमी (इलाहाबाद) में एक बड़ी साहित्यिक गोष्ठी हो रही थी। मंच पर शहर के जाने-माने और रसूखदार जज साहब, न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने अपने भाषण के जोश में कह दिया कि  "वैसे देखा जाए तो प्रेमचंद इतने बड़े कथाकार नहीं थे कि..." 

बस, इतना सुनना था कि हॉल में बैठे वरिष्ठ लेखक भैरव प्रसाद गुप्त आगबबूला हो गए। वे अपनी सीट से उठे और जज साहब पर चिंघाड़ते हुए बोले  "आप प्रेमचंद के बारे में क्या जानते हो? क्या समझते हो? किसने आपको जज बना दिया? भागो यहां से!" 

भैरव जी इतने गुस्से में थे कि वे काटजू साहब को मंच से धक्का देने के लिए सीढ़ियों की तरफ लपके। जज साहब ने स्थिति की नजाकत को समझा और बिना एक सेकंड गंवाए तपाक से मंच से छलांग लगा दी। 
वे इतने डरे हुए थे कि नंगे पैर ही हॉल के बाहर भाग खड़े हुए और उनका अर्दली (चपरासी) उनके जूते हाथों में उठाए उनके पीछे-पीछे दौड़ रहा था! 

यह किस्सा सिर्फ हंसाता नहीं है, यह बताता है कि उस दौर के लेखकों में अपने साहित्य और प्रेमचंद जैसे पुरोधाओं के लिए कैसा सम्मान और कैसी बेखौफ दीवानगी थी। ममता कालिया ने ऐसे ही दर्जनों चटपटे, मगर सच्चे किस्सों से इस किताब को एक 'ब्लॉकबस्टर' बना दिया है।  आगे पढ़ें

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एक दिन पहले

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