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शिव कुमार बटालवी: मैनूं विदा करो मेरे राम मैनूं विदा करो

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मैनूं विदा करो मेरे राम
मैनूं विदा करो
कोसा हंझ शगन पाउ सानूं
बिरहा तली धरो।
ते मैनूं विदा करो ।
(मुझे आप सब विदा करें, मुझे आंसुओं का शगुन दो और मेरे हाथ पर बिरह रखो और मुझे विदा करो) 

वारो पीड़ मेरी दे सिर तों
नैण-सरां दा पाणी
इस पानी नूं जग्ग विच वंडो
हर इक आशक ताणीं
प्रभ जी जे कोयी बून्द बचे
उहदा आपे घुट्ट भरो
ते मैनूं विदा करो
(मेरे सिर से दर्द, ग़म को वारो जैसे कई बार लोग रुपये सिर से वारते हैं ठीक वैसे ही शिव बटालवी यहां पर पीड़ा वारने को कह रहे हैं, आंखों से बहते आंसू के साथ। फिर शिव कहते हैं कि लोग फिर इस पानी यानी आंसू को संसार के हर एक प्रेमी को बांटे। फिर भी कोई बूंद बचे तो उसे ख़ुद पी जाओ और मुझे विदा करो।) 

कोसा हंझ शगन पाउ सानूं
बिरहा तली धरो ।
ते मैनूं विदा करो ।

प्रभ जी एस विदा दे वेले
सच्ची गल्ल अलाईए
दान कराईए जां कर मोती
तां कर बिरहा पाईए
प्रभ जी हुन तां बिरहों-वेहूणी
मिट्टी मुकत करो
ते मैनूं विदा करो
(हे ईश्वर! इस विदा की वेला में एक सच का ऐलान करता हूं। जब हम मोतियों जैसी बहुमूल्य वस्तु का दान करते हैं तब हमें बिरह जैसी अनोखी चीज़ मिलती है। शिव कहते हैं कि जब उन्हें इस बिरह से भी मुक्त करो, विदा करो) 

कोसा हंझ शगन पाउ सानूं
बिरहा तली धरो ।
ते मैनूं विदा करो ।

दुद्ध दी रुत्ते अंमड़ी मोई
बाबल बाल वरेसे
जोबन रुत्ते सज्जन मर्या
मोए गीत पलेठे
हुन तां प्रभ जी हाड़ा जे
साडी बांह ना घुट्ट फड़ो
मैनूं विदा करो ।
(मां तब ही चल बसीं जब उन्हें मुझे दूध पिलाना था। पिता भी बचपन में चले गए। जवावी में मेरी प्रेमिका चली गई और मुझसे ये कड़वे गीत फूट पड़े। हे प्रभु अब इतना कसकर मेरा हाथ मत पकड़ो और मुझे विदा करो) 

कोसा हंझ शगन पाउ सानूं
बिरहा तली धरो ।
ते मैनूं विदा करो । 

10 महीने पहले

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