हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है गुल्म जिसका अर्थ है - ऐसा पौधा जो एक जड़ से कई होकर निकले और जिसमें कड़ी लकड़ी या डंठल न हो। कवि केदारनाथ अग्रवाल ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है।
यह वसन्त जो
धूप, हवा, मैदान, खेत, खलिहान, बाग में
निराकार मन्मथ मदान्ध-सा रात-दिवस साँसें लेता है,
जानी-अनजानी सुधियों के कितने-कितने संवेदों से
सरवर, सरिता,
लता-गुल्म को, तरु-पातों को छू लेता है
और हज़ारों फूलों की रंगीन सुगन्धित सजी डोलियाँ
यहाँ-वहाँ चहुँ ओर खोल कर मनोमोहिनी रख देता है
वही हमारे
और तुम्हारे अन्त:पुर में
आज समाए
हमको-तुमको
आलिंगन की तन्मयता में एक बनाए।
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