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नागार्जुन: असहमतियों की साखी रचने वाले कवि, जिनकी यायावरी ने दुनिया से साक्षात्कार कराया

साहित्य
                
                                                         
                            नागार्जुन की विपुल रचनात्मकता की जिन विशेषताओं पर ध्यान जाता है वह है उनकी दृष्टि का निर्माल्य और असहमति का सौंदर्य। उनकी कविताओं और उपन्यासों के वस्तु वैविध्य पर गौर करें तो हम देखते हैं कि नागार्जुन की रचनाऍं समाज, राजनीति, संस्कृति और व्यवस्था पर एक क्रिटीक की तरह हैं। सच्चा कवि व्यवस्था का पोषक नहीं, आलोचक होता है। वह सहमतियों का गान नहीं लिखता, असहमतियों की साखी रचता है। कबीर के सदियों बाद ऐसी विस्फोटक चेतना की कविताएं केवल नागार्जुन ने लिखी हैं।
                                                                 
                            

अरे इन दोउन राह न पाई---लिख कर कबीर ने हिंदू और मुसलमानों दोनों कौमों की दिशाहीनता और पारस्परिक कलह को वाणी दी और उनकी धर्मांधता पर प्रहार किया तो नागार्जुन ने सदैव आम आदमी के पक्ष में, आम आदमी की हैसियत से सत्ता-व्यवस्था, राजनीति, अहंकार, पद, ऐश्वर्य और पूंजी की मुखालफत की। कबीर ने भी आँखिन देखी की साखी लिखी थी, नागार्जुन भी अपनी ऑंखों एवं ऐंद्रिय बोध पर भरोसा करते थे। 
 
नागार्जुन को बाबा कह कर पुकारते थे। मैथिल पंडितों के परिवार में जन्मे नागार्जुन की शिक्षा-दीक्षा किसी विश्वविद्यालय में नहीं, संस्कृत पाठशाला में हुई। धीरे धीरे उनकी प्रतिभा का मार्जन हुआ और उनके भीतर का कवित्व आकार लेने लगा था। शुरू से ही यायावरी के मिजाज़ ने उन्हें उस दुनिया से साक्षात्कार कराया जिसे वे विश्वविद्यालयों की गतानुगतिक शिक्षा से नहीं प्राप्त कर सकते थे।

संस्कृत पढ़ी, बाँग्ला के अच्छे जानकार थे ही, सिंहल जाकर पालि पर भी महारत हासिल कर ली। कहा जाता है कि वे अपभ्रंश, सिंहली, तिब्बती, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी भाषा भी न केवल बखूबी पढ़ लेते थे बल्कि इन भाषाओं के साहित्य से सुपरिचित भी थे। अपनी फाकेमस्ती में भी उनके निकट दैन्य का निवास नहीं  था। कहीं के लिए निकलना, कहीं अँटक जाना, भटकते हुए फिर किसी दिशाहीन गंतव्य की ओर निकल पड़ना बाबा के स्वभाव में था। वे अपने मित्रों, शिष्यों के घर पहुँच कर अपनापे से रसोई में जा धमकते थे और फिर पाक-कला पर रससिद्ध प्रवचन करते। 

उनकी झिड़कियां सुनने को मिलतीं, नाराजगी भी। पर यह सब ज्यादा दिन न चलता। वे फिर उसी अपनत्व से पेश आते। बाबा में वाकई बाबा का स्वभाव बोलता था। वे जिस तरह अपनी उजड़ी गृहस्थी और छोटे बच्चों को छोड़ यायावरी में रम गए थे, उन्हें केवल अपना नहीं, देश- दुनिया का ख्याल था। उनकी परवाह थी। वे कविता में व्याप्त गतिरोध को दूर करना चाहते थे। वह कविता जिसका जन-जीवन से कोई वास्ता न हो, वह उन्हें स्वीकार न थी। कविता का उनके लेखे प्रयोजन यह न था कि वह जीवन में सुभाषित की तरह पेश आए बल्कि वह मानव जीवन के दोषों को उजागर करे, उनका प्रक्षालन भी करे। उनकी कविता यही करती है। 

जैसा कि नागार्जुन की जीवन-शैली से स्पष्ट है, वे किसी भी विचार या विचारधारा के बजाय आम आदमी के पक्ष को अहमियत देते थे। इसलिए वे जीवन में किसी भी बद्ध विचारधारा के वशीभूत नहीं रहे। प्रारंभ में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने किन्तु भारत पर चीनी आक्रमण के बाद सदस्यता छोड़ दी। आपात काल में इंदिरा गॉंधी के मुखर विरोधी रहे। जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रान्ति के पक्ष में आवाज़ उठाई और फणीश्वर नाथ रेणु के साथ जेल गए पर जब संपूर्ण क्रांति के नायकों का बिखराव देखा तो खिचड़ी विप्लव देखा हमने कह कर उपहास भी किया।

 उनकी कविता में भाषा और बोलियों के जिस मिक्स्चर की बात अरुण कमल ने कही है, वही उनकी ताकत है। यह वह भाषा है जनता जिसके सर्वाधिक निकट है। इसी भाषा और ऐसे ही अटपटे रूप विधान में कविता के शिखर रचे जा सकते हैं। शास्त्र का हमेशा अनुधावन ही नहीं होता, उसे रचना और तोड़ना भी पड़ता है। तारानंद वियोगी की किसी बात पर नागार्जुन का यह कहना कि 'कोई शास्त्र आपको जीवन को समझने में थोड़े ही मदद करेगा। शास्त्र के अनुसार अगर वस्तु और स्थिति को देखिएगा तो फिसल कर गिरियेगा।' 

नागार्जुन ने अपनी कविता के स्वरूप को शास्त्र सम्मत बनाने के बजाय जरूरत के तईं उसे तोड़ा, रचा और विकसित किया है। उन्होंने मैथिली में कविताएं लिखीं, उपन्यास लिखे तो हिंदी की ठेठ जनभाषा में कविताएं और उपन्यास भी। बॉग्ला में भी उन्होंने प्रभूत संख्या में कविताऍं लिखीं। किन्तु हिदी समाज में जनकवि के रुप में समादृत नागार्जुन को पहचान मैथिली काव्य से मिली। 'पत्रहीन नग्न गाछ' पर उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाज़ा गया।
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2 वर्ष पहले

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