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डॉ. दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' की 2 चुनिंदा ग़ज़लें

उर्दू अदब
                
                                                         
                            सारे रूपक सारे बिंब विधान अधूरे हैं 
                                                                 
                            
तेरे सम्मुख सबके सब उपमान अधूरे हैं ।

भक्त अधूरे होते  हैं जैसे भगवान बिना ,
भक्तों के बिन वैसे ही भगवान अधूरे हैं ।

खुद से ही प्रारंभ न होता हो बदलाव अगर ,
युग परिवर्तन के सारे अभियान अधूरे हैं ।

अभी-अभी तो आए ही हो लो चल पड़े अभी 
अभी न जाओ अभी मेरे अरमान अधूरे हैं ।

घर में घर के जैसा कुछ भी लगता नहीं मुझे , 
बिना तुम्हारे घर के सब सामान अधूरे हैं ।

तेरे बदन की खुशबू मुझमें ऐसी है पैबस्त 
इत्र, अगर ,परफ्यूम, धूप ,लोबान अधूरे हैं ।

जिनमें प्यार मुहब्बत वाले फूल न शामिल हों , 
रिश्तों के वे सारे ही गुलदान अधूरे हैं ।

व्यर्थ मेरे लिए हर नदी हो गई

व्यर्थ मेरे लिए हर नदी हो गई ,
इतनी' प्यारी मुझे तिश्नगी हो गई ।

तीरगी के लिए  मन ये' तड़पेगा' फिर ,
हद से' ज्यादा अगर रोशनी हो गई।

पूछता हूं मैं ' खुद से ही' खुद का पता ,
ज़िन्दगी इस तरह अजनबी हो गई ।

आपका साथ पाकर मेरी जिंदगी ,
रह न पाई मे'री आपकी हो गई ।

इक भ्रमर मनचला बाग में आ गया ,
और सहमी सी' हर इक कली हो गई ।

कृष्ण की बांसुरी सुन के हर गोपिका ,
बावली बावली बावली हो गई ।

जाने' कैसा तरक्की का' मौसम है' ये 
फूल-सी जिंदगी शूल-सी हो गई ।

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10 घंटे पहले

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