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शारिक़ कैफ़ी: ग़लत था रोकना अश्कों को यूँ भी

shariq kaifi famous ghazal nahin main hausla toh kar raha tha
                
                                                         
                            


नहीं मैं हौसला तो कर रहा था
ज़रा तेरे सुकूँ से डर रहा था

अचानक झेंप कर हँसने लगा मैं
बहुत रोने की कोशिश कर रहा था

भँवर में फिर हमें कुछ मश्ग़ले थे
वो बेचारा तो साहिल पर रहा था

लरज़ते काँपते हाथों से बूढ़ा
चिलम में फिर कोई दुख भर रहा था

अचानक लौ उठी और जल गया मैं
बुझी किरनों को यकजा कर रहा था

गिला क्या था अगर सब साथ होते
वो बस तन्हा सफ़र से डर रहा था

ग़लत था रोकना अश्कों को यूँ भी
कि बुनियादों में पानी मर रहा था

3 महीने पहले

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