हे मेरी प्रिये ! कहाँ भटक रही हो इधर उधर ?
रुको और सुनो तो ! अपने सच्चे प्रेम का स्वर ।
धुन उसकी साथ रहेगी हर उतार चढ़ाव में,
हे प्रिये ठहरो यहीं, क्षण हैं अब विश्राम के ।
प्रेमियों का मिलन ही धरता है यात्रा पर विराम,
कोई भी ज्ञानी पुरुष इस तथ्य से नहीं अनजान !
प्रेम क्या है ? किसे तनिक भी आभास है,
आज की मृगतृष्णा में छिपा आज का उल्लास है,
भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, पता नहीं,
पर, मिलन की देरी में सुनो कुछ लाभ नहीं ।
हे प्रिय ! चुम्बनों की वर्षा से अब न तुम भयभीत हो,
यौवन ही है जिसके हर क्षण में प्रेम की ही जीत हो।
कमेंट
कमेंट X