कैसे मानूँ कि ज़माने की ख़बर रखती है
गर्दिश-ए-वक़्त तो बस मुझ पे नज़र रखती है
मेरे पैरों की थकन रूठ न जाना मुझ से
एक तू ही तो मिरा राज़-ए-सफ़र रखती है
धूप मुझ को जो लिए फिरती है साए साए
है तो आवारा मगर ज़ेहन में घर रखती है
दोस्ती तेरे दरख़्तों में हवाएँ भी नहीं
दुश्मनी अपने दरख़्तों में समर रखती है
जाने क्या सोच के रो लेता हूँ उस वक़्त 'फ़राज़'
ज़िंदगी जब मिरे आग़ोश में सर रखती है
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