वाह दाता वाह! क्या खेल रचाया है?
देकर अत्यंत सुख या दुःख
कभी ना कभी तो तूने
सबको ज़रूर नचाया है
आकर इस माया नगरी में
कुछ संवर गए तो कूच बिखर गए
ऐसे ही तो खेल खेलकर
तूने सबको सिखाया है
वाह दाता वाह! क्या खेल रचाया है?
हो कर हमारी रग -रग से वाक़िफ़
कितना सोच समझकर हमें बनाया है
जो आए थे इस दुनिया में
करके तुझसे एक ही वादा
था की हम ना भूले कभी तुझको
था तूने अच्छे से समझाया
करके दुआ भेजा तूने हमें
आकाश से इस धरती पर
कहा तूने की हूँ अब मैं
एक आज़ाद परिंदा
जा उड़! फैला ले अपने पर
ले जो तू चाहे कुछ भी किंतु
तेरे लिए खुले हैं ये दर
देख दुनिया के ये रंगीन रंग
भूले हम सरे अपने सपने वादे
अंत में, भारी पड़ी ये दुनिया दारी
पड़ा इस का बोझ सब पर भारी
फिर गुम होकर इसी दुनिया में
हम भूले तेरे सारे सपने वादे
जो खाईं मैंने ठोकर
तुझ से जुड़ा होकर
फिर भी बरसाई कृपा तूने मुझ पर
हुआ मेैं सच से परिचित
जब मिला तेरा आसरा
अंत में तूने ही संवारा
तूने ही सम्भाला
बस करता है हमारी दृष्टि पर निर्भर
कि ये पृथ्वी है स्वर्ग या नरक
इस नज़र को तू सुबुद्धि दे
कि आऊँ मैं अपने भाई जनों के काम
उन पर भी हों वर्षा ज्ञान की
लेकर तेरा प्यारा सा नाम
आख़िर में, खोकर मैंने तुझको
मुझ में ही तो पाया है!
वाह दाता वाह! क्या संसार बनाया है?
वाह दाता वाह! क्या खेल रचाया है?
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