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ओपन स्पेसः फ्रॉम अर्थ टू एटर्निटी-द ग्लोबल रेस टू एक्सप्लोर एंड कॉन्क्वैर द कॉस्मॉस

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अंतरिक्ष में होड़ की रोमांचक कहानी

ओपन स्पेसः
फ्रॉम अर्थ टू एटर्निटी-द ग्लोबल रेस टू एक्सप्लोर एंड कॉन्क्वैर द कॉस्मॉस
लेखक : डेविड अरियोस्टो
प्रकाशक : नॉफ

हाल ही में, लॉन्च हुई यह किताब अंतरिक्ष के मलबे के खतरों से लेकर मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने की संभावनाओं पर चर्चा के साथ उन इंजीनियरों तथा भौतिकविदों से भी मिलवाती है, जो विज्ञान-गल्प को हकीकत में बदल रहे हैं।

पत्रकार डेविड अरियोस्टो अपनी नई किताब ओपन स्पेस  के जरिये आज की अंतरिक्ष दौड़ का जानकारीपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि यह दौड़ एक निर्णायक मोड़ पर है, जहां तकनीकी क्षेत्र के दिग्गज और प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र मिलकर ब्रह्मांड में मानवजाति के भविष्य को निर्धारित करने की होड़ में लगे हैं। उनके अनुसार, अंतरिक्ष फिलहाल ‘संभावनाओं का खुला कैनवास’ है। 

डेविड अमेरिका में निजी कंपनियों द्वारा बढ़ते अंतरिक्ष अन्वेषण की ओर ध्यान दिलाते हैं। वह 2024 में ‘इंट्यूटिव मशीन्स’ के लूनर लैंडर ‘ओडिसीस’ का उदाहरण देते हैं, जो किसी निजी कंपनी द्वारा बनाया गया पहला अंतरिक्ष यान था, जिसने सफलतापूर्वक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने में सफलता हासिल की। इसने अंतरिक्ष उद्यमियों की नई पीढ़ी की महत्वाकांक्षाओं को साकार किया। अरियोस्टो चीन के तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन की विस्तार योजनाओं और चंद्रमा पर उसकी स्थायी मौजूदगी के प्रयासों का भी जिक्र करते हैं, जो अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को जन्म दे रही हैं। चीन अपने वाणिज्यिक उद्यमों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रहा है। रूस, भारत, जापान व यूरोपीय संघ भी इस दौड़ में हैं। डेविड मिशन कंट्रोल में लिए गए तुरंत फैसलों और लॉन्च के रोमांचक, सांस रोक देने वाले पलों को बेहद सरल तरीके से बताते हैं। वह उन शोध प्रयोगशालाओं से लेकर, जो पृथ्वी की सुरक्षा के लिए योजनाएं बनाती हैं, एंटीमैटर फैक्टरी और मार्स डेजर्ट रिसर्च स्टेशन तक का सफर करते हैं। वहां वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि पृथ्वी के बाहर कोई बस्ती कैसे जीवित रह सकती है। लेखक की इस वैश्विक यात्रा में, हम उन दूरदर्शी लोगों से मिलते हैं, जो भविष्य के सपने बुन रहे हैं, और उन इंजीनियरों तथा भौतिकविदों से भी, जो विज्ञान-गल्प को हकीकत में बदल रहे हैं। 

सैटेलाइट्स हमारी कल्पना से भी कहीं ज्यादा जरूरी हैं। इनकी मदद से लोग अपनी जगह का पता लगा पाते हैं और गूगल मैप जैसे एप्स का इस्तेमाल करके कहीं भी आ-जा सकते हैं। हवाई सफर, खासकर समुद्र के ऊपर से होने वाला सफर, ब्रॉडबैंड-कम्युनिकेशन सैटेलाइट पर निर्भर करता है। मौसम के सटीक पूर्वानुमान भी मौसम संबंधी उपग्रहों पर ही निर्भर रहते हैं। डेविड अरियोस्टो ओपन स्पेस में बताते हैं, ये सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में तैरते मलबे की चपेट में आ सकते हैं। अभी एक करोड़ से भी ज्यादा, नमक के दाने जितने छोटे टुकड़े अंतरिक्ष की कक्षा में मौजूद हैं। चूंकि, ये टुकड़े 17,500 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हैं, इसलिए ये किसी स्पेस सूट में छेद कर सकते हैं या सैटेलाइट को नुकसान पहुंचा सकते हैं। किताब का पहला हिस्सा रोमांचक कहानी के जरिये पाठकों को बांधे रखता है (खासकर चांद पर उतरने की कोशिशों का विस्तृत वर्णन), पर दूसरे हिस्से में कहानी की कोई एक मजबूत कड़ी नहीं है। यह कहानी अंतरिक्ष के मलबे के खतरों से लेकर मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने की संभावनाओं और तकनीकी चर्चाओं पर भटकती रहती है। 

फिर भी, अंतरिक्ष में दिलचस्पी रखने वालों को इसमें बहुत कुछ दिलचस्प मिलेगा। हजारों वर्षों तक तारों को निहारने के बाद, अब इन्सान उनके बीच सफर करने के लिए औजार बना रहा है। जोश से भरी, विस्मयकारी और दिल को छू लेने वाली यह किताब इस शानदार सफर को चरम तक ले जाती है और उसमें हमारी जगह तलाशती है।

एक दिन पहले

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