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बुल्ले शाह: राँझा राँझा कर दी नी मैं आपे राँझा होई

bulleh shah famous poetry ranjha ranjha kar di ni main aape ranjha hoyi
                
                                                         
                            

राँझा राँझा कर दी नी मैं आपे राँझा होई
सद्दो नी मैनूँ धीदो राँझा हीर ना आखो कोई
(राँझा-राँझा करते हुए मैं ख़ुद राँझा हो गयी हूं, अब मेरी पहचान हीर नहीं बल्कि राँझा ही है)

राँझा मैं विच्च मैं रांझे विच्च होर ख़याल ना कोई
मैं नहीं उह आप है आपनी आप करे दिल-जोई
(अब राँझा मुझमें है और मैं राँझा में हूँ, अब मैं कुछ भी नहीं हूँ जो कुछ है राँझा ही है)

जो कुझ साडे अन्दर वस्से जात असाडी सोई
जिसदे नाल मैं न्योंह लगाया ओही जैसी होई
(जो कुछ हमारे भीतर है वही हमारी जात है, मैंने जिससे प्रेम किया मैं उसी के जैसी हो गयी)

चिट्टी चादर लाह सुट कुड़िए, पहन फकीरां दी लोई
चिट्टी चादर दाग लगेसी, लोई दाग न कोई
( बुल्ले शाह करते हैं कि हटा दो यह सफ़ेद चादर और फ़क़ीरों के कपड़े पहन लो। क्यूंकि सफ़ेद चादर में दाग़ लग सकता है लेकिन फ़क़ीर के कपड़ों में नहीं। 

तख्त हजारे लै चल बुल्ल्हिआ, स्याली मिले न ढोई
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई।
(बुल्ले शाह कहते हैं कि हमें राँजा के गाँव ले चलो, क्यूंकि हीर के गाँव में हमारा ठिकाना नहीं है।)

3 वर्ष पहले

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