तेरी आँखों में जो ठहरा है वो समंदर होगा,
मेरे हिस्से का भी शायद कोई मंज़र होगा।
मैंने चाहा है तुझे दिल की इबादत की तरह,
वरना दुनिया में मोहब्बत का भी क्या घर होगा।
— अजीत पड़वार
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