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नज़्म

                
                                                         
                            रूठना बिछड़ना दोनों अलग शै है मियां
                                                                 
                            
तुम रूठ तो जाते हो अक्सर
मगर बिछड़ने की सोचते नहीं
हम तुम्हारी इस अदा पर कुर्बान हैं मियां

जो रूठ गया उसे मनाया जा सकता है
बिछुड़े से मिलना मगर मुश्किल है मियां
इस राज को तुम जानते हो
तुम तो बड़े जानकार हो मियां

हमने तुमसे मोहब्बत की और मारे गए
तुम दिल्लगी करके भी बच निकले हो मियां
धोखा तुम करो और इल्ज़ाम हम पै मढ़ो
दिल के खेल में भी तुम दिमागदार हो मियां

मुझे इश्क़ के खेल का चस्का लगाने को,
तुम जानबूझकर हारते हो मियां
तुम हार कर भी जीत रहे हो यह बाज़ी
तुम इस खेल के बड़े फ़नकार हो मियां

तुम अपनी चाल चल कर मासूमियत से,
हमें अपनी चाल में फंसाते हो मियां
ना जीने देते हो ना मरने दे रहे
ये क्या कहर हम पै ढ़ा रहे हो मियां
हम तो तुम्हारे आशिक हैं
हमें ही सूली पर लटक रहे हो मियां।
-अमित कुमार मिश्रा
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