दिलरुबा.
ये उम्र का दायरा है,
कभी दौर हमारा भी था...
गली, मोहल्ले, नुक्कड़ पे,
शोर हमारा भी था...
मोहब्बत हमें भी किसी से,
पहली बार हुई थी...
हमारी भी किसी से,
पहली मुलाकात हुई थी...
पहाड़ के एक पत्थर पर,
रुमानी अंदाज लिख था...
दिल की शक्ल में,
दिलरुबा का नाम लिखा था...
पलकों की दीवारों पे,
पहरा नींद का यूँ होता था...
उसके पायल की रुनझुन से लेकिन,
मन बावरा होता था...
ये उम्र का दायरा है,
वरना...बंदा आज़ाद परिंदा था...
बंदा आज़ाद परिंदा था...
-अमोल हरिदास
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