यहाॅं कोई किसी की फरमाइश़ नहीं करता.....
सहने वाला रुख़सत सह जाता है, नुमाइश़ नहीं करता।
ये तो धरती है जो शिद्दत से चाहती है,
वरना बादल बरसने की ख़्वाहिश नहीं करता।
यदि दो वक्त की रोटी में,सच में सुकूं है,
तो कोई आसा़इशों की ख़्वाहिश नहीं करता।
कहने को तो ज़िंदगी गुजारने को महज़ पाक मन चाहिए, पर महज "पाक-मन"की गुंजाइश़,कोई नहीं करता।
रास्ते में चलने को तो हर कोई तैयार है,
पर क्या मंज़िल तक जाने को बेकरार हैं?
पाने की तलब तो बहुत है,
पर क्या कोई सच में तलब़गार है?
प्रश्नों से मन भरा है, पर उत्तर खोजने की ज़िद नहीं करता मन तो बहुत कुछ करता है, पर अब मन नहीं करता।
रोज़- ब-रोज़ इस मन को कोई समझाता है,
पर क्या ? जब बेतरहा खुद से ये हार जाता है।
ये बेखुदी़ पन ,कलम से पन्नों पर उतर जाता है।
शायरी करने वाला, यूं ही शायरी थोड़ी करता हैं।
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