आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सोचूं की नंगें पांव क्यूं

                
                                                         
                            सोचूं की नंगें पांव क्यूं
                                                                 
                            
निकली जहान में।
बिख़रा रखें थे कांटे
नियति ने राह में।।
किस ओर से गुज़रू जो
मिले राह मखमली।
मिलेगी सुकून किस की
पलकों की छांव में।।
मिली बातें मीठी-मीठी दिल
कड़वा हीं मिला।
खायें है कितने धोखे मोहब्बत
की चाह में।।
जी चाहे जा कर पूछूं कभी ऐ
नसीब-ए-ज़िंदगी
कितनी है मुश्किलें अभी
खुशियों की राह में।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर