सोचूं की नंगें पांव क्यूं
निकली जहान में।
बिख़रा रखें थे कांटे
नियति ने राह में।।
किस ओर से गुज़रू जो
मिले राह मखमली।
मिलेगी सुकून किस की
पलकों की छांव में।।
मिली बातें मीठी-मीठी दिल
कड़वा हीं मिला।
खायें है कितने धोखे मोहब्बत
की चाह में।।
जी चाहे जा कर पूछूं कभी ऐ
नसीब-ए-ज़िंदगी
कितनी है मुश्किलें अभी
खुशियों की राह में।।
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