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मन की उथल-पुथल

                
                                                         
                            व्यर्थता में मनगढ़ंत कहानियां रचता हूं।
                                                                 
                            
काल्पनिक संसार गढ़ता हूं
सुख-दुःख का भान करता हूं
प्रफुल्लित व द्रवित होता हूं।
अंत में परिणामतः
सुन्दर वर्तमान खोता हूं।

सपने संजोना
मधुकर है काल्पनिकता में।
पर हक़ीक़त में-
आंकनी होती है हैसियत अपनी।
काबिलियत, ओहदा और सम्पत्ति अपनी।

हालांकि मुश्किल नहीं है
यूटोपिआ को तोड़ना।
बशर्ते आप मोहग्रस्त न हों।
मोह.. क्षण क्षण कमज़ोर करता है।
यह लौ का वह सुन्दर लूप है
जिसमें पतिंगे का भस्म होना सुनिश्चित है।

बेहतर है त्यागना बन्धन,
आत्मजागृति हेतु..।
ख़ुद को जानना
सकल संसार को जानना है।
निकलना होगा शोर-शराबे की दुनियां से
शांति, शीतलता खोजना है
मुझे खामोश होना है।
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22 घंटे पहले

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