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फर्ज की सीमा रेखा

                
                                                         
                            छोड़ चला जब वो
                                                                 
                            
अपना घर–आँगन,
नन्ही गुड़िया ने थाम लिया
उसका दामन—
“पापा, फिर कब आओगे?”

भर आया कंठ,
शब्द रूठ गए होठों से,
मौन उतर आया
पूरे माहौल पर,
आँखों से बह चली
संयम तोड़ती अश्रु-धारा—
कैसे समझाए
उस नन्हे से चमन को
कि वर्दी पहनने वालों की
राहों में
लौट आने का वादा
अक्सर अधूरा रह जाता है।

देशभक्ति के फ़र्ज़ में
कोई अनुबंध नहीं होता,
न तारीख़ लिखी जाती है
न गारंटी दी जाती है।
“बेटा, जल्द लौटूँगा”—
सीने में तूफ़ान दबाकर
झूठी तसल्ली दे
वो निकल पड़ा
कर्तव्य की कठिन राह पर।

मन में ग़म भी था,
पर उससे बड़ा गर्व था—
कि रब ने उसे चुना है
माँ भारती की
सीमाओं का प्रहरी बनने को।
ये नौकरी नहीं,
ये इबादत है—
जहाँ हर क़दम
बलिदान से तौला जाता है।

फ़र्ज़ भारी था—
एक तरफ़ आँचल, आँगन और किलकारी,
दूसरी तरफ़
सीमाओं से निभाई जाने वाली
अटल वफ़ादारी।

फौगाट की क़लम साक्षी देती है—
यार, आसान नहीं होता
परिवार और देश के बीच
सीमा रेखा खींचना,
पर जब बात वतन की हो,
तो सपूत
दिल पर नहीं,
तिरंगे पर हाथ रखकर
फ़ैसला करते हैं।
-दिलबाग सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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