आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं ब्राह्मण हूँ

                
                                                         
                            यदि आ जाऊं हिंसा पर मैं, तो परशुराम बन जाऊंगा,
                                                                 
                            
अन्याय के उस हर मस्तक को, मैं धूल में मिलाऊंगा।
यदि आ जाऊं अहिंसा पर, तो ऋषि वशिष्ठ बन जाऊंगा,
क्रोध की जलती ज्वाला को, मैं बोध से बुझाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं अपनी पर, तो आर्यभट्ट बन जाऊंगा,
शून्य से लेकर अनंत तक, मैं नया भूगोल बनाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं ज्ञान पर, तो शंकराचार्य बन जाऊंगा,
अद्वैत सत्य की महिमा से, मैं जग को राह दिखाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं तर्क पर, तो दयानंद बन जाऊंगा,
पाखंड और कुरीति को, मैं जड़ से ही मिटाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं भक्ति पर, तो तुलसीदास बन जाऊंगा,
प्रभु के पावन चरणों में, मैं खुद को ही बिसराऊंगा।
यदि आ जाऊं देशभक्ति पर, तो मोहित शर्मा बन जाऊंगा,
वतन की खातिर मर मिटकर, अमर तिरंगा बन जाऊंगा।
यदि आ जाऊं अंतरिक्ष पर मैं, तो सूर्य को भी नाप आऊंगा,
पर यदि आ जाऊं मैं अपनी पर, तो रावण भी बन जाऊंगा।
यदि आ जाऊं राजनीति में, तो चाणक्य बन जाऊंगा,
तुम मुझे ना छेड़ सत्ताधारी, तेरी सत्ता भी गिरा दूंगा।
और सशक्त राजा बैठा कर गद्दी पर,
तुझे सत्ता से भगा दूंगा।
-गोपाल शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर