यदि आ जाऊं हिंसा पर मैं, तो परशुराम बन जाऊंगा,
अन्याय के उस हर मस्तक को, मैं धूल में मिलाऊंगा।
यदि आ जाऊं अहिंसा पर, तो ऋषि वशिष्ठ बन जाऊंगा,
क्रोध की जलती ज्वाला को, मैं बोध से बुझाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं अपनी पर, तो आर्यभट्ट बन जाऊंगा,
शून्य से लेकर अनंत तक, मैं नया भूगोल बनाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं ज्ञान पर, तो शंकराचार्य बन जाऊंगा,
अद्वैत सत्य की महिमा से, मैं जग को राह दिखाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं तर्क पर, तो दयानंद बन जाऊंगा,
पाखंड और कुरीति को, मैं जड़ से ही मिटाऊंगा।
यदि आ जाऊं मैं भक्ति पर, तो तुलसीदास बन जाऊंगा,
प्रभु के पावन चरणों में, मैं खुद को ही बिसराऊंगा।
यदि आ जाऊं देशभक्ति पर, तो मोहित शर्मा बन जाऊंगा,
वतन की खातिर मर मिटकर, अमर तिरंगा बन जाऊंगा।
यदि आ जाऊं अंतरिक्ष पर मैं, तो सूर्य को भी नाप आऊंगा,
पर यदि आ जाऊं मैं अपनी पर, तो रावण भी बन जाऊंगा।
यदि आ जाऊं राजनीति में, तो चाणक्य बन जाऊंगा,
तुम मुझे ना छेड़ सत्ताधारी, तेरी सत्ता भी गिरा दूंगा।
और सशक्त राजा बैठा कर गद्दी पर,
तुझे सत्ता से भगा दूंगा।
-गोपाल शर्मा
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