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खामोशी: दोहे

                
                                                         
                            खामोश लब्जे भी कुछ कहती है।
                                                                 
                            
बस,महसूस करने की शक्ति सब में नहीं होती है।।

खामोशी की आवाज दुनिया नहीं सुनती है।
सब आज कल खुद में ही सिमटे रहते है।।

दूर दूर तक अपना कोई नजर नहीं आता।
यूं तो दुनिया में लोगों की भीड़ बहुत है।।

आवाज भी दो तो दुनिया नहीं सुनेगी।
यूं तो मोबाइल में कंटेंट लिस्ट बहुत है।।

मुस्कुराओ तो पूछती, दुनिया क्यों मुस्कुरा रहे हो।
गम में रहो तो हाल भी नहीं पूछती है।।

ख़ामोशी की भाषा दुनिया तक नहीं पहुंचती है।
एक बार आजमा कर देखें कौन कितना अपना है।।

शायद यह शब्द एक सपना ही है कि सब अपने है।
सुख में सौ मेले है लेकिन दुःख में अकेले है।।

यही, सच और यथार्थ वास्तविक दास्तां है।
हम खुद ही हमारे अपने है और हौसले ही सहारे है।।
-ममता तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
23 घंटे पहले

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