आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क्षमा

                
                                                         
                            क्षमा, क्षमा और क्षमा,क्यों कौंधता है मुझमें ?
                                                                 
                            
कितनी बार क्षमा कर दूंँ, नहीं निर्बल मुझे समझे।।

यदि क्षमा कर भी दूँ मैं, होगा यह भीषण अपराध ।
रोती सिसकती घुटती आहें, रहने देंगी निरपराध ?

पापियों का मनोबल तोड़ूँ, आज बनूँ सबकी आवाज।
आंँसू पोंछ खड़ी हूंँ अब मैं, निर्बल की मैं रखूंँगी लाज ।।

एक कलम की स्याही सूखी, चार कलम ले आऊँ ।
बेनकाब कर डालूँ चेहरे, सच का दर्पण दिखलाऊँ ।।

विष्णुरूप परशुराम ने भी बारंबार किया संहार ।
क्षत्रियों से धराविहीन करने इक्कीस बार था प्रहार।।

क्षमा क्यों करूंँ कृतघ्नों को, रही न केवल मेरी कथा।
'एकला चलो' चलते-चलते, कितनों की जुड़ गई व्यथा।।

आओ रणचंडिका बनें, रणभेरी हुंकार भरें ।
उर में अम्बा स्थापित कर रक्तबीज संहार करें ।।

क्षमा शोभती है उसे जो नहीं निर्बल हो ।
आंँसू पोंछ खड़ी हो जाओ शक्तिसंपन्न प्रबल हो ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर