क्षमा, क्षमा और क्षमा,क्यों कौंधता है मुझमें ?
कितनी बार क्षमा कर दूंँ, नहीं निर्बल मुझे समझे।।
यदि क्षमा कर भी दूँ मैं, होगा यह भीषण अपराध ।
रोती सिसकती घुटती आहें, रहने देंगी निरपराध ?
पापियों का मनोबल तोड़ूँ, आज बनूँ सबकी आवाज।
आंँसू पोंछ खड़ी हूंँ अब मैं, निर्बल की मैं रखूंँगी लाज ।।
एक कलम की स्याही सूखी, चार कलम ले आऊँ ।
बेनकाब कर डालूँ चेहरे, सच का दर्पण दिखलाऊँ ।।
विष्णुरूप परशुराम ने भी बारंबार किया संहार ।
क्षत्रियों से धराविहीन करने इक्कीस बार था प्रहार।।
क्षमा क्यों करूंँ कृतघ्नों को, रही न केवल मेरी कथा।
'एकला चलो' चलते-चलते, कितनों की जुड़ गई व्यथा।।
आओ रणचंडिका बनें, रणभेरी हुंकार भरें ।
उर में अम्बा स्थापित कर रक्तबीज संहार करें ।।
क्षमा शोभती है उसे जो नहीं निर्बल हो ।
आंँसू पोंछ खड़ी हो जाओ शक्तिसंपन्न प्रबल हो ।।
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