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बुझा मिला

                
                                                         
                            मैं उनसे मिला, तो क्या मिला..
                                                                 
                            
ज़िंदगी का कोई, तजुर्बा मिला..।

दिन को दरख़्त पे, टंगा कर आया..
घर पहुंचा तो, अँधेरे में डूबा मिला..।

हमने उनको दिल में जो जगह दी तो..
ज़माने को बैठे-बैठाये, इक मुद्दा मिला..।

चारागर तो मर्ज़ को मेरे, जान गया था..
मगर दवा की तो, दर्द कुछ बढ़ा मिला..।

उम्र है कि नज़र–फरेब है, मालूम नहीं..
आईने में चेहरा तो, पहले से बुझा मिला..।
-पवन कुमार "क्षितिज"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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